Saturday, 2 October 2021

भोली प्रजा

भोली प्रजा बेधर्म राज के 

क्रिया कलापों पर
गूंगी बहिर प्रलापी
विपदाओं के
अवतरण द्वार पर कैसे
भारी भरकम शिला चढायें !

नंगा नाच मौत के किस्से
किये गये दुष्कर्मों के
पाप पुण्य का लेखा जोखा
जैसे हतप्रभ बाली को
किरदार
राम के अंतिम पाठ पढ़ायें !

विपरीत प्रकृति के
जब कदम उठाये
भोगे नहीं प्रजा
निर्वाह करे कर्तव्यों का
बेदखल
सिंहासन घोषित करदे
राजधर्म का धर्म निभाये,
नुक्कड़ नुक्कड़ नहीं गिनाये
होती हिंसा हत्याओं की
थाना चौकी
रपट लिखी दुसवार सूचियां
नगर दरोगा
जन गण
मन का विस्वास जगाये,

लगा बुझाई लांच की
आंच से बाहर
धार तेल की देखे
आगी अंगरे न्याय के चूल्हे 
भेदभाव के ख्याल
खलल न खौले चढ़ी कढ़ायें !

गली तिराहे
तिरका तीन चौगड्डे
पर्व प्रबंधन के
प्रस्तावित नक्शे
खींच सके न अलग से रेखा
दहशत हिंसा हत्या
हातिमताई अदहरा,
मौके पर मौके
खोज रही जो भीड़ भाड़ की
चूक फिदाईन
जहन बताशा
हूर बहत्तर गांठ गडाइन
जिमजिम पानी
पीर फकीरों का पहरा,

भूत प्रेत नहीं
वे मरघट के
जीते जी पाले जिन्नों के
जीवित जिगर जिनाउर
आतंकी आकाओं के
मनुहार मरें बेहिचक अढ़ाये!

फीच फीच परदनी के जैसे
घाटों धांधर नहीं निचोयें
ढोरे पानी
धान पान खीरा थर 
अर्चन
तुलसी चौरा
दिया सहारा जले रात भर,
सिंहासन की
अर्दली त्याग कर
क्षितिज का सूरज
देता रहे प्रकाश
अंधियारों की चिकनी चुपड़ी
सुने नहीं
न हो विचलित बगदरी बात पर,

झूठ खरीदे
बिके नहीं आस्था
जयकार जुलूसों के भीतर
चीख न बूडे
फिरें न जुलमी द्वारे द्वारे
भगवा चेहरे फ्रेम मढ़ाये !

भोलानाथ

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