Saturday, 16 October 2021

कुछ दूर तक तुम मेरे साथ हो प्रिये

कुछ दूर तक 

तुम मेरे साथ हो प्रिये 

और रिश्तों के रागी बिखरे पड़े हैं !

सहेजा समेटा 

बहुत इन हाथों से अपने 

कंधों के ढोये जिद पर अड़े हैं ! 

समझाऊं कैसे

रटाऊ तोते के जैसे

खोखल के बाहर 

गुलेलों की शातिर निगाहें

बन कर चुनौती खड़ी हैं,

बचने बचाने को इनसे 

कोई गुरुकुल नहीं है 

जुगत शेष रहने की 

अनगिन विधाएँ

जहन में जंग खाती पड़ी हैं,

तुम ही कहो 

गुर कुछ सीखें प्रिये 

अभी नरम टांठ माटी के कच्चे घड़े हैं ! 

तुलसी सुमति का संज्ञान 

रट कर 

आचरण को अपने भिगोयें

भेंट पायी पुरखों के हाथों 

छलकती गंगाजली से,

विद्रोही उमर के ज्वाला मुखी को 

पहिना कर सिंगौटी 

सांड़ों सा साधें 

फिर 

वाणी का अमृत ढारें गली से,

पनघट परिंदों सा चहकें

धूप छाँव 

बरखा के भींजे हम भी खड़े हैं ! 

समझौते समय से हमने किये 

रूठे न खीझे किसी से 

ख्वाहिश की 

आगी में जब तब 

उपलों के जैसे सुलगते रहे हैं, 

न जिद की माँ से 

न बाबू को चिंतित किया है

बह निकले पानी सा 

दशा दिशा तय की काट काट चट्टाने 

नदिया के माफिक बहे हैं,

हिलाई न चौखट कभी 

न तोड़े दरवाजे 

जैसे थे वैसे घुये गहरे गड़े हैं !


भोलानाथ

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