दीवार कवच हैं
राजदार हैंहर धड़कन की
नहीं खींचती रेखाएं !
रखती हैं
खिड़की दरवाजे
मौसम के अनुकूल
आचरण की आदत अलखाएँ!
गतिरोधों के
परियाय से बाहर
सोच अलहदा
ताक झांक कर
भीतर अपने,
दिवारहीन परिवेश में
रहकर
भावावेग भटकते
जिये उमर भर
टूटे सपने ,
मूंड गोड
मर्यादा की रक्षक
बाहर के कांटा कंटक
कितना भी बल खाएं !
छोड़ भरम के सिरे
फकीरी लीक
भ्रांति के
भुतिया बोली का
केवल झूठ तंत्र है,
पावन मनोगति की
भावभूमि का
बन अनुगामी
सच्ची सच्ची
मुह की कही मंत्र है,
बेतरतीब बहस की
अनुपयोगी
बढी लताओं की
छांट सही कर शाखाएं !
इस उस पार की
बात न कर
सब तेरे अपने हैं
झांक न जंगले
खोल किवाड़े,
धूप छांव सिर
गंध रोटियों की
आने दे
पत पानी की
बतबड़ आये न आड़े,
पके बाल की
चांद सफेदी
पोत न पालिस
लहराने दे अधपकी पखाएँ
भोलनाथ
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