रूह दिवाल तोड़कर
विधवा जैसे लाज समेटेघूंघट में जी गई जिंदगी
खाक अतीत जवानी
थकन छांव से सकुच निहारे !
महक छोड़ उड़ गई न जाने
सांस चिरैयां
प्रेम विहीन हुईं निरमोही
लावारिस सपनों की खैरात
भविष्य की गणना सगुन विचारे !
खुले केश औंधती
सीप सी पलकें
झर झर अंसुआ खालिश
खरी खोट की सावन झड़ियां
झरे बिरौनी
बुझी बुझी है ओंठ की लाली,
रंगविहीन सफेद घूँघटा
पहचान निरीह
प्रतीक अमंगलकारी
पीड़ा परियाय उंगलियां
मिश्री ओठ
निगाह साध बाघ मतवाली,
चली चाल नातेदारी रिश्तों के
बिम्ब बदलते रहे युगों से
कभी किया न पूंछ परख
कितने सच्चे हैं
खरबूज छुरी के गुनतारे !
जिया झूठ उधारी बलभर
खाया पिया सुकून विलासी
खौले खून देह जश्न को
निबल निरीह
टेंटुआ
जैसा चाहा वैसा खूब मरोड़ा,
गांव की
बेबा बेटी बहन बनी न
निर्लज्ज आंख की
नजर निहारें तौलें तन
रंगीन लबादे का
कोढ़ चुये भीतर से थोड़ा थोड़ा,
टटिया पेल घनी बौछार
उमड़ती बाढ़ की धार
दिवार की मिट्टी चियां चियां
थर घोले बेबस नीव
लाज छांव कस हालात सम्हारे !
इतिहास का साक्ष्य
समझ में आया
तन अधम अधोगति
जिया हमेशा देवी दुर्गा
काली के काटे भी
जरासंध सा उठ होता रहा खड़ा,
सुमति रही होती यदि गाडर में
मृत्यु परे
क्या हिम्मत होती साउज की
भीड़ चीर खा जाता
अपने नाम किये
भय का तमगा बहुत बड़ा,
जागो उठो दौड़ चलो
परिवर्तन के पथ पर जिये न कोई
अनभल आँचर खिल्ली तंगहाल
टिमटिमी के जैसे
जब चाहे तब फूंके बारे !
भोलानाथ
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