Saturday, 2 May 2020

हिंदी साहित्य केंद्र में नवगीत [भोलानाथ के नवगीत ]धुप ढली

धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !
कूपों के बाहर
बमीठों के जंगल
चन्दन के
विरवों ने पाले
लाकर जहरीले साँपों को
गंध की डरैया,
चुन चुन कर
चोंच से तिनकों के
घोंसले बनाती है
संशय हीन
झूलती टहनियों की
शीतल छाँव में चिरैया,
सुरमैया
पंखों
भरती उड़ानें
कैसे बचाये
सोने के अंडे
संकट के
सागर में डारे
और कितने गहरे !
धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !
पीढ़ी दर पीढ़ी
पुरखों की
पुस्तैनी बीनों में
बिच्छु बियाने
भंग पिये खोहों में
सोये हैं कब से संपेरे,
जहरीले साँपों के
फन पर उड़ती
चह्चहाती रोती गौरैया
सिर पर है सूरज
अभी तक न जागे
समय के उधेरे !
जंग लगी
जन्मों की
बीनों पर
सांप
क्या नचायेंगे
चूर हैं नशे में
वंशगत नसेड़ी
कानों के बहिरे !
धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !
माँदर की
थापों में
छाहुर जगाते
बोल गूंज रहे गाँव में
घोल रहे मिशरी
कानों में बिरहा रसीले,
कंठों की राग
और टिमकी की लय पर
थिरक रही बधुयें
रेतीली आँधियों के
अंधड़ से निकल कर
आये जो कबीले,
अन्तोदय के
द्वार
क्या खोलेंगे
अंधे सिपाही
जालपुरी चौखट पर
चमगादड़
टीलों में
चीलों के पहरे !
धूप ढली
सिमटी परछाईं
खोज खोज
राही अपनापन
भीड भाड
भगदड के शोर में
नकार कर
कुंठित मन चहरे !
अंतहीन मंजिल
का पता नहीं
ढोते थकाने
पाँव थके
बौली कुआं
घाटों के
पानी के
मेंढक जो ठहरे !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 9425885234

bholanath ke navgeet


Friday, 1 May 2020

हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत [भोलानाथ के नवगीत ]सुनते हो भाई

सुनते हो भाई
बगिया में
बांस की डरैया
फिर फूल आई !
उजड़ी बंसखंडी
अंगडाई ले कर
उठी है
मुह भर जमुहाई ! 
अमुआं के आँगे
बांसों का वन है
पीछे बरस रहे
कूंच भरे महुये , 
पके पके कैथों की
भीनी भीनी खुशबू
नकुआ महकाये
सूंघ रहे कहुये,
ऊँचे बांसों की
फुनगी
बेड़िन के जैसे
नाच रही राई !
सुनते हो भाई
बगिया में
बांस की डरैया
फिर फूल आई !
उजड़ी बंसखंडी
अंगडाई ले कर
उठी है
मुह भर जमुहाई ! 
चौपालों के चुनगुन
भगोरिया पँतरोई
मालिन गिलहरी
मैना सी चहके,
छू छू के
गुड़हल की कलियाँ
अनबोलन ठिठोली
पाँव भौंरों के बहके,
प्राण बसे 
बंसवट की रीझी
लगती तितिलियाँ
गईया लवाई !
सुनते हो भाई
बगिया में
बांस की डरैया
फिर फूल आई !
उजड़ी बंसखंडी
अंगडाई ले कर
उठी है
मुह भर जमुहाई !
भोलानाथ

हिन्दी साहित्य के केंद्र में नवगीत [भोलानाथ के नवगीत ] बिराने शहर में

नवगीत की पाठशाला के मनीषियों और प्रबंधकों के लिये[हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत ]
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
माटी तुम्हारी  है
शहर है तुम्हारा
हम
ठहरे परदेशी , 
ले आया पेट
हमे 
बँधे रहे खूँटे से
बने के मवेशी.
लपटाई   
माया की रंगत
धुलि नहीं
सूखी नहर मे !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
पानी पवन
क्रोध आरत
जय घोस कीरत
सब हैं तुम्हारे ,
बने रहे
धूल पाँव की 
तब ही जिये हैं 
सडक के किनारे , 
सपने
संजोये
बिखरते रहे हैं
पहर की पहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
कविता की किल्लत
साँसों की लय
और ओठ
फफरी लगाये,
निभाते रहे धर्म
एकाकी
स्वाति की बरखा
जिया हिलगाये,
मुह औधे हिल्ले
रोटी
फंसी है
अंधे कहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...