नवगीत की पाठशाला के मनीषियों और प्रबंधकों के लिये[हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत ]
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
माटी तुम्हारी है
शहर है तुम्हारा
हम
ठहरे परदेशी ,
ले आया पेट
हमे
बँधे रहे खूँटे से
बने के मवेशी.
लपटाई
माया की रंगत
धुलि नहीं
सूखी नहर मे !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
पानी पवन
क्रोध आरत
जय घोस कीरत
सब हैं तुम्हारे ,
बने रहे
धूल पाँव की
तब ही जिये हैं
सडक के किनारे ,
सपने
संजोये
बिखरते रहे हैं
पहर की पहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
कविता की किल्लत
साँसों की लय
और ओठ
फफरी लगाये,
निभाते रहे धर्म
एकाकी
स्वाति की बरखा
जिया हिलगाये,
मुह औधे हिल्ले
रोटी
फंसी है
अंधे कहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
भोलानाथ
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
माटी तुम्हारी है
शहर है तुम्हारा
हम
ठहरे परदेशी ,
ले आया पेट
हमे
बँधे रहे खूँटे से
बने के मवेशी.
लपटाई
माया की रंगत
धुलि नहीं
सूखी नहर मे !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
पानी पवन
क्रोध आरत
जय घोस कीरत
सब हैं तुम्हारे ,
बने रहे
धूल पाँव की
तब ही जिये हैं
सडक के किनारे ,
सपने
संजोये
बिखरते रहे हैं
पहर की पहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
कविता की किल्लत
साँसों की लय
और ओठ
फफरी लगाये,
निभाते रहे धर्म
एकाकी
स्वाति की बरखा
जिया हिलगाये,
मुह औधे हिल्ले
रोटी
फंसी है
अंधे कहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
भोलानाथ
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