Friday, 1 May 2020

हिन्दी साहित्य के केंद्र में नवगीत [भोलानाथ के नवगीत ] बिराने शहर में

नवगीत की पाठशाला के मनीषियों और प्रबंधकों के लिये[हिंदी साहित्य के केंद्र में नवगीत ]
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
माटी तुम्हारी  है
शहर है तुम्हारा
हम
ठहरे परदेशी , 
ले आया पेट
हमे 
बँधे रहे खूँटे से
बने के मवेशी.
लपटाई   
माया की रंगत
धुलि नहीं
सूखी नहर मे !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
पानी पवन
क्रोध आरत
जय घोस कीरत
सब हैं तुम्हारे ,
बने रहे
धूल पाँव की 
तब ही जिये हैं 
सडक के किनारे , 
सपने
संजोये
बिखरते रहे हैं
पहर की पहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
कविता की किल्लत
साँसों की लय
और ओठ
फफरी लगाये,
निभाते रहे धर्म
एकाकी
स्वाति की बरखा
जिया हिलगाये,
मुह औधे हिल्ले
रोटी
फंसी है
अंधे कहर में !
बनी नहीं
पहचान
अभी अपनी
बिराने शहर में !
नाहक ही
बहे जा रहे हैं
मुह की
मीठी बहर में !
भोलानाथ

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