क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !
हुडदंगी की
छीछा लेदर
कब समझेगी उपमानों की
रंग रंगोली,
काकर पाथर पन्नी पुट्ठे
भरे बोरियां
जतन जोगनिया
ताम झाम की हो ली,
अभ्यस्त झूठ रजवाड़े का
लतमार मदारी
रहे न अपनी हद में !
क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !
डमरू माँदल के तडकारे
भीड़ बरेदी
उलुकानों की
खूब बढ़ी है,
हलाकान बेहाल तबाही
छीना झपटी
मदिरा भांग सी
देह चढ़ी है ,
शैली शिल्प का लाटा फांदा
झलक रहा है
कलम कबाड़ की मद में !
क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !
खर पतवार की साझेदारी
उपज की छाती
कितने
और मढेंगे खेत,
पवन फागुनी गाल बजाये
क्या जाने
बैसाख मास की
आंधी पानी रेत,
पोंदी पैंया की खैरातें
गिन गिन कितने
ईंट धरेंगी कद में !
क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !
भोलानाथ
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