Sunday, 15 October 2023

अंध आँधियों के प्रखर वेग में

अंध आँधियों के प्रखर वेग में 

पीठ अड़ाए 

मूक बहिर स्वांगों की लय पर 

थिरक जमूरी थिरकन 

भूख प्यास के घाट उतरते !


चिल्लाचोंथ आघात के हाथों  

खेल खिलौनों का खेला क्यों 

मुग्ध मना मन 

देख रहा सिंहासन 

संवेदित जन तिल तिल मरते !


चीख सुने न झुक कर देखे तख्तोताज  

के नीचे 

गुर्राते गुलबाघ 

दबाये दाढ़ दहाड़ें 

चांट रहे चुपचाप रक्त के लिथड़े पंजे, 


उलटे धनुष प्रत्यंचा खींच चढाने वाले  

जुगत खोजते खींसा खींसा 

झांक रहे 

भीतर से 

लग लग खिड़की संध झरोखा गंजे, 


दफ्तर दफ्तर हिलगे प्रकरण हिलें न 

छूंछ सतह में 

टूटे हांथ 

ओंठ की विनती 

पांव थके जीवित मुर्दों को जीवित करते ! 


चढ़ी धूप पावों लग छाया भ्रष्ठ व्यवस्था की 

मुंह फेरी 

भरी तरैयों आँखी 

मिल बरगद से 

दुखड़ा अपना फफक फफक कर रोये, 


संझा बिरियों का सूरज फिर डूबा 

गोधूली घर रात समाई 

वही लीक दिन देख 

गलौरों 

टपके आंसू जैसे बिरौनी काजल धोये,  


सब का साथ विकाश चतुर्दिक 

ताज के  नारों में 

कट रही चाव से भक्त जनों की 

शेष शराबी 

लत सी इस घर की उस घर में धरते !


बैठे जो उस पार खुमारी में उनसे 

कोई उम्मीद नहीं 

अपनी बीड़ी से घर लेस

जिया की 

हिरन कुलांचे जी भर खेलें  फ़ाग,


ओहदे के  गंभीर नहीं वह भूल भजन 

ओठों  के 

औटन लगे कपास 

बे पानी पकी खीर न 

हंडियों खिचड़ी उगले आग ही आग, 


पेट पवन निस्तार बहाने सौ सौ खांसी 

मीठी मीठी दाब डकारी 

थकें न शातिर 

जहर जुलाब का 

कुनकुन कुल्ला चौगान ओछरते ! 


भोलानाथ

पाप पुण्य का ख्याल किया न

पाप पुण्य का ख्याल किया न 

सपनों में 

सच बोला 

बोता रहा सदा ही कांटे गुखरू गलियां !


साँझ सकारे माघ नहाते 

मंत्र जाप के 

संकल्पों में 

हौले हौले भुनती रही मछलियां !


जटाजूट माथे का चंदन छलता रहा 

बिरानी आँख 

जहन छाती की धड़कन 

जैसे कालनेमि का मायावी किरदार, 


देवी दुर्गा जैसी दादी की थाती के 

चोखे चोखे 

चंद चिरंगे 

परनाना के आंगन खेले खेला चौकीदार,


बांक बर्रइयों के गठबंधन का 

भुनुर भुनुर 

कोरस मुख कितना 

और उड़ाये बैठी फूल तितिलियाँ !


अंधों की बारात चने की फांक 

कंठ की 

की सूखी खांसी नकुओं के 

अवसाद का निथरन उड़े हवाओं में,


लीद हगे की छपी सुर्खियां. 

अश्वारोही 

अश्वमेघ की आँखों देखी 

दफन मरे मन जीवित नब्ज शिराओं में, 


ऊंचे बोल की छूंछ कुबोली 

गिनते गिनते 

उलटी गिनती 

गिद्ध तमासा देख उड़ीं गलगलियाँ !


मसले फूल गंध सी क्षमा नहीं 

उपवन में फैली 

गोबर गंध सड़ांध हवा की 

असह जिया अकबकी सांस उकताये,


परपंचों का धुआँ धुआँ पथ सड़क छाप 

छुटभैयों के 

ज्ञान का सागर 

बरसाती नालों सा पुलियों पर छिछलाये ,


भाड़ चना फोड़े न फोड़े चटक चटक 

चटका सी 

खेत बिराती 

फूट रही हैं बिरबाही की फलियां !


भोलानाथ

चिल्हर वाली फुटकर

 चिल्हर वाली फुटकर फुटकर 

पीठ पेंदारे सह सह चोट 

बेसाही भैंस उठे न 

पानी भीतर मजे मजे पगुराये !


लाठी भांज भितरिया खीझ न जाने 

तामस तर जी 

रपके गोड़ गोसइयां 

बोल कुबोली खैनी जैसे मुह चुचुआये !


धधके धौंस न भय की भीतर

देख लठैती 

बंडी बांह सिकोडी गरजन 

तलख़ बेखबरी कान जुआं नहीं रेंगे, 


बोते बहम मिले बहुतेरे सीधी अखियों  

सधे न सूरज 

तिरछी चितवन 

चरितावलि बिरझे हैं जनम जनम के भेंगे,


अरझी बेर कुम्हड़ बतिया सी छिदी देह 

कनपटी के कांटे

दिन दिन चढ़ती धूप 

हवा की झंझा झली नोक गहराये !


पापी पेट नअमृत उगले थके पांव पथ 

बैताली भ्रम 

लदा पिठाहीं 

पूंछे पश्न हजार दिखे न ठौर ठिकाना , 


ऊब उबासी उमस भरा तन सुसताये 

किस छाँव 

न थमने दे पग पांव मुआं 

मुश्किल है घिसट रपक के चलते जाना,


गांव के गोईंड़े गुनियों के गुन्तारे 

हीचा हारा 

उकताया उल्लास

गांठ क्या खोले वक्ष मसल रह जाये  !


प्यासी आँख रंजी रीझी हैं ओंठ का 

सागर लहर नहा के 

बहर बही 

मछली सी उजर बजर बगुलों के आगे,


वर्तमान उत्साह पर्व सी भेंट भविष्य की  

रजत रेख जो 

जहन में उभरी 

जैसे जतन जिया उठ नींद से जागे,


लाभांशी उपहार नहीं यह जोर जुगत के 

सौगातों की 

डुगडुगिया 

लफ्फाजी मुंह रंगे कबूतर सरग उड़ाये !


भोलानाथ

अखरा अढ़ाई

 अखरा अढ़ाई अगेती पढाई का 

रसिक राग उम्दा 

अलापों में आपने 

गीत श्रंगार के 

वीरानियों में शैल शिखर गाये हैं  !


सुन सुन के सिरोमणि शोहरत की 

दादें, कानों दिन रात की 

निधि वन की 

निधियों से उठ उठ 

महफ़िल में आपकी दौड़े चले आये हैं !


पुरखों की कही सुनी कानों की गीता 

मिला जो सुभीता 

कान्हा को जाना 

पहचाना राधा को 

मीरा की पायल टूटीं जहां, 


बहती बहर रुनझुनियों की रुनझुन 

गुरियों गढ़ी हथलड़ी की 

कड़ी के 

चिन्ह वंदन में अंटकी 

भटकती है लेखनी हीर सी वहां,


बिहारी की गागर से छलका जो सागर 

अंजुरी उलीचा 

पी पी के परनाले 

बरखा 

उलेली बाढ़ बूडों के जैसे उतराये हैं !


प्रेम रसिक भ्रमर भांति कलियों के 

बिरझे  

अरझे जतवा जतन के 

अधिआई रातों की चंदा 

दिखी न चुनरिया सी चांदनी लपेटे,


गीतों का सूरज उगा के दिलों में 

दिखाओ हमें भी 

चकवा की 

आंखों में आती 

उतरती जोंधइयां सरग सुख समेटे, 


उड़ती गोधूलि ढकती तरैयां 

लौटें परदेशी 

प्राणों की प्राणपरी 

गुथ गुथ 

गजरे सा प्राणों को प्राण में सजाये हैं !


लोक गीतों  के रूप रस राग गुण 

गाते गाते 

सागर के गहरे  

गोते लगाते खपी हैं 

कई कई जन्मों की कितनी ही पीढ़ियां,


भावाविभोर हुई राधा की दुनियां 

थमे नहीं आंसू 

विरह के 

उतर गये कदम से कन्हैयां 

मुरलिया थमा के तोड़ गये सीढ़ियां, 


हमें भी चढ़ाओ मुहब्बत की उंची उंची 

श्रेणियां 

सेंधुर सिंधौरा की 

बचे लाज 

खेत गली नुक्क्ड़ व्यभिचार के सताये हैं !


भोलानाथ

Tuesday, 12 September 2023

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Sunday, 5 February 2023

बहो री बहो

 बहो री बहो 

ऊँचे ऊँचे बहो 

रमती छाया की शीतल पवन !


पीपल की फुनगी 

बरगद से ऊँचे 

बांहों में भर भर गगन !


बहुरूपिये बादल  की 

चुलबुलिया छाया से उबा 

उबासी में उबले जिया ,


कानों सुना कलकतिया कौतुक 

अकारथ 

कुल्फी के जैसे खाया पिया ,

     

झांसों दिलासों पले  

ठग ठौरों के 

भेदन का खोजो जतन !


बगिया के बगुले 

समुन्दर न झांकें 

डबरियों की लीलें मछरियाँ ,


वंशज शनि के जानें न

कथा व्यथा 

मूक बाउर सी डूबती कछरियां ,


रोओ न सिसक सिसक 

हिलको न धार देख 

गाँव की नदी का पतन !


रटी राग गिद्धासन 

पक्षकार पोंढकी का 

अलट पलट पंखुआ खंगाले ,


आफत के मेलों की लाचारी 

टेंट दबी 

दौलत करती है हवाले ,


सौदों की सूची में 

शामिल हैं 

जस तस शव के ओढ़ाये  कफ़न !


भोलानाथ

गुंजन गीत

 गुंजन गीत 

परागी नद में बूड़ बसंत 

सिराने करने लगा फसाद !


बूढी काया हाड पसुरियों 

भर सकेगा 

क्या फिर यौवन का उन्माद ! 


सिकुड़ी देह दांत बिन बिसरी 

स्वाद चटोरी जीभ 

मसोस जिया मन भारी भारी 

मुँह का मुस्का खींच चढ़ाये ,


पुष्प धनुष सर सधे न साधे 

हारे हीचे मन के 

लक्ष्य रूप आकार विविधि 

सन्दर्भ सार के रोचक पाठ पढ़ाये ,


गांठी गाँठ की 

गली गठरियों बोझ 

बुद्धि के प्रस्तावित संवाद ! 


कामकंदला के पग घुंघरू 

लय  की थिरकन दिल 

लहर सांस की साध सके तो 

साध माधवानल जैसा संगीत ,


ठूंठ हुए बरगद का पता पूंछ न 

मिटे महल महके पुरवाई 

धुले कोर न काजल जैसे 

अमर आँख की प्रीत,


जाया समय फिरे न लौटे 

रिसरिस चुये 

छपरिया जैसे छाती का अवसाद ! 


रन बन बोले मूक कोयलिया 

घने पलाशों के वन में 

भौंरों का गायन 

पायल पग बाँध पवन बौराई, 


मेरे आंगन आम बौर की 

मौर बंधी न फिर बसंत क्यों 

औने पौने 

बृद्धाश्रम में पेल रहा ठकुराई, 


इधर उधर के 

कोने कोने बिखरी 

बल्लरियों की गादर गादर याद ! 


भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...