अंध आँधियों के प्रखर वेग में
पीठ अड़ाए
मूक बहिर स्वांगों की लय पर
थिरक जमूरी थिरकन
भूख प्यास के घाट उतरते !
चिल्लाचोंथ आघात के हाथों
खेल खिलौनों का खेला क्यों
मुग्ध मना मन
देख रहा सिंहासन
संवेदित जन तिल तिल मरते !
चीख सुने न झुक कर देखे तख्तोताज
के नीचे
गुर्राते गुलबाघ
दबाये दाढ़ दहाड़ें
चांट रहे चुपचाप रक्त के लिथड़े पंजे,
उलटे धनुष प्रत्यंचा खींच चढाने वाले
जुगत खोजते खींसा खींसा
झांक रहे
भीतर से
लग लग खिड़की संध झरोखा गंजे,
दफ्तर दफ्तर हिलगे प्रकरण हिलें न
छूंछ सतह में
टूटे हांथ
ओंठ की विनती
पांव थके जीवित मुर्दों को जीवित करते !
चढ़ी धूप पावों लग छाया भ्रष्ठ व्यवस्था की
मुंह फेरी
भरी तरैयों आँखी
मिल बरगद से
दुखड़ा अपना फफक फफक कर रोये,
संझा बिरियों का सूरज फिर डूबा
गोधूली घर रात समाई
वही लीक दिन देख
गलौरों
टपके आंसू जैसे बिरौनी काजल धोये,
सब का साथ विकाश चतुर्दिक
ताज के नारों में
कट रही चाव से भक्त जनों की
शेष शराबी
लत सी इस घर की उस घर में धरते !
बैठे जो उस पार खुमारी में उनसे
कोई उम्मीद नहीं
अपनी बीड़ी से घर लेस
जिया की
हिरन कुलांचे जी भर खेलें फ़ाग,
ओहदे के गंभीर नहीं वह भूल भजन
ओठों के
औटन लगे कपास
बे पानी पकी खीर न
हंडियों खिचड़ी उगले आग ही आग,
पेट पवन निस्तार बहाने सौ सौ खांसी
मीठी मीठी दाब डकारी
थकें न शातिर
जहर जुलाब का
कुनकुन कुल्ला चौगान ओछरते !
भोलानाथ
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