जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं
उस
दूर दराजी
प्रीतम को यह संदेशों की पाती !
हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित
तू ही
बनजा
दूत रे बदरा सम्हरे बिरह न छाती !
हो स्वीकार विनय जो मेघ दूत सा
अटक न जाना धवल देंह गिरि
शिखर सिरोमणि
कानन की मधुरिम स्वर लहरी,
जैसे बरस गया वह नदी के आंचल
लिपट के सोया
और यहां मैं
रही प्रतीक्षा में ऊमस सी ठहरी,
दिन गिनते दुख बिरह बंटे न बढ़ती बाढ़ सी
घाट
जिया के
बहें सहारे तिनकों को अर्थाती !
पहुंचा पास नहीं प्रीतम के और न
वापस लौट कहानी
यायावरी बैल सा
निज गुण हया विरत कुछ गाया,
आये गये चौमासी आवाहन की अलख
सुने न लखे इशारे
आकुल व्याकुल
विचलित मन सावन सावन बिलखाया,
रंग उड़ा मेंहदी का धुल रहा महावर
घायल
पायल
शुष्क हलक न भूले बिसरे बरसे स्वाती !
केशकुंद पुष्पों के गुंफन कान शिरीष
पुष्प सब सूखे
बे प्रीतम
घर घाट घटे न तन का मीठा मीठा ताप,
बेजल फूले नहीं कदम न महके ताजा ताजा
फूल बगीचे
लगा हो
जैसे रतिफल पर भी कल्पवृक्ष का श्राप,
कथा नहीं यह पीर है मन की कर इतना
उपकार
रे बदरा
बुझने को है भरी दिया की बाती !
भोलानाथ
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