Saturday, 25 June 2022

सीके से व्यामा की दूरी

सीके से 
व्यामा की दूरी  
ठाढे ठाढे बिलैयां 
पहिनती हैं शोहरत के माले ! 

चंचल छली 
चापलूसी के माहिर 
श्रीफल उपन्ना 
ओढ़ाते हैं चूहे चढ़ चढ़ के आले ! 

दशकों के लटके 
झटके कला के 
देखता रहा 
और सुनता रहा 
गूंगे बौरों सा सारा शहर,
गहराई गीतों में 
झलकी नहीं 
लोकगीतों के शिल्पी 
सुनाते रहे 
एक जैसी बहर, 

जाल बुनती रही 
ठाठ मलगा कोरैया 
मनमानी 
मकड़ों की टोली घर बैठे ठाले ! 

पंजे घिसे 
खंभा अब भी सलामत खड़ा है 
खिसियानी खीझों से 
डर के 
पहिने न दुनिया सुथन्ना,
तलवारें टूटी 
घीचें कटी हैं 
बहती रही नदियां नारी 
इतिहास जीवित है 
ओढ़े उपन्ना, 

मौसम खुला है 
न आंखें दिखाओ 
नचाओ न बादल 
उंगलियों में फिर काले काले ! 

मुकुट बादशाही का 
फिर लौटे मुमकिन नहीं 
म्यूजियम में रहने दो 
तीर तोप
तरकस तलवारें ,
जागी अधजागी 
करवट कवायत का 
व्यूह तोड़ रैयत का साहस 
सुने नहीं 
ओछी ललकारें, 

कबीलों ने 
काट दी अस्तीनें 
काम नहीं आयेंगे
जयचंद टोपियों के पाले ! 

भोलानाथ

Tuesday, 14 June 2022

रुका न रोके नभ का सूरज

 


रुका न रोके नभ का सूरज
शिखर चढ़ा है
कोई खबर करो !

अहम अंधेरों की
दर बदर बदरिया
दीपक द्वार धरो !

मानसून मजमून लिफाफा
खुला नहीं
पढ़ रहे विदेशी नई कीर्ति के
रोज नये अखबार,
भ्रमित भटकते संसय जैसे
मेघदूत का यक्ष अचंभित
देख नदी सी
आम्रकूट रस धार ,

शोध पत्र फट रहे
पुलिंदे कखरी
पकती पुतरी पीर हरो !

बदल गये हैं
राजपथों के अश्व रथी रथ
बग्घी म्याना
जजबाती हो गईं उंगलियां,
तहस नहस संदेश हवा में
बेर की डारी
फतवा बांचें
नीम बकायन की गलगलियां,

आंजत आंजत काजर
कानी हो गई
पानी आंख भरो !

ताने खड़े गुलेल
सरग में छेद की खातिर
लक्ष्य जहन का
जैसे चारों खूंट बिजूका,
आंख सधे तो
उजबक मुह खुल जाये
मुरबा मींज क्षोभ रंज का
जोर जतन छल बल सब चूका,

मुट्ठी कसी तसल्ली के
घर सावन सा
रिमझिम खूब झरो !

भोलानाथ










चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...