Monday, 29 December 2025
धुकधुकी वक्ष की मेट बटोही
सुनते सुनते जाग
प्रच्छाल पगड़िया प्रवाल
चला चल पीछे पगहा आगे कोई नाथ नहीं है !
उनकी उन में रह लेने दे जी लेने दे उन्हें रहीसी
उनके जलसों जांघ उँघार न
जल
निज आग यकीनन ओझल मंजिल राह सही है !
चुटकी चुटकी नून धुरकती घाघ चिंउँटियों में
मरहम की रेफ नहीं बस
कोंथी फांस सी चिथड़े चिथड़े
त्वचा नवेली खुरदुर खुरदुर रही पुराने घाव की,
धुंध कुहासों की जरमेटी नस नस कसी जिंदगी
खरमासी अँकबार के जैसी
आंख हताशा झार धुआं निरबार
देख मधुमास अगाडी कुसमित कली उराव की,
अनुमोदित अनुमानों की स्वप्न सरीखा मंजिल
मिले या लिथड़े पग पथ पर थम जायें
धरा धूल की
तिलक लिलारे नथुनों नथुनों महक रही है !
अटक भटक कितने पथ छूटे हारे थके पांव
तन बोझ धनुष सी रीढ़ झुकी
फुंक गई अकारथ सांस त्वचा तन हाड़न
चमगादड़ सी झूली तब मिली पृथक पगडंडी,
उपकृमी उड़ानों से तय होगा किसका है
यह खुला खुला आकाश
बिखरते पंख पतिंगों जैसा रह रह उड़ें धनीमुख
हारिल सा भ्रम पकड़े रहा पांव सरकंडी,
भय भागा न भ्रम टूटा खोखल लौंची डार
उड़ानों में पर टूटे
और उमड़ती रही खटास पेट की
उगला मर्म न मुख की खुल के कही है !
समझ में आई परछाईं की आस्तीनी मनुहार
उन्नींदे खींच तैन तोड़ी तुरपाई
उतार फेंक दी
देह झंगुलिया छूटे हाट बाजार जिरह के मेले,
मजहबी भीड़ मजमों से छंटे नहीं कट गये
आंधियों का रुख भांप
महकते मौसम अमराई का अनुराग
बाटिका के प्रांगण में पुरवाई सा बहे अकेले,
जज्बाती गीतों की ठहरी है बारात कंठ में
जनमास
प्रवासी रात थिरकते पांव
सधे न राग रागिनी जैसे मुख में जमी दही है !
भोलानाथ
भूल पाओगी न उम्र भर
उस अधूरी
मुलाकात की
आशिकी तुम प्रिये, !
बोले नहीं मुख से मुख
प्यार
जन्मों का
आंखों में जी भर जिये !
गुलदस्ते रिश्तों के मिलते रहे
राह भर
किन्तु पल भर को
कोई मिला न तुम्हारी तरह,
बे बरसे सावन बे महके फागुन
आते जाते रहे
तीज
फगुन सा गा के गुलाबी जिरह,
सुरसा सी अपनी ही
घट बढ़ती छाया
परीक्षक
रही छल का सागर पिये !
विचलित हुआ न व्याकुल हुआ मन
बिंबित
झरोखों के
घूंघट में उगते उस चांद को,,
फाग फगुआ के उत्सव से महसूसे
लम्हे जिया
सजते
नयनों के चर्चित संवाद को,
महकती रही सांस सरगम
टूटी
नहीं
लय राग सजती रही है हिये !
आंखों के आगे से गुजरे
यदि गीत तो
दहलीज पर
मेरे दिल के लिखा नाम पढ़ना,
वादे वफ़ा सब यादों के खोंखल में
छोड़ा
याद
आयेगा मिथ्या मिथकों का गढ़ना,
आहूत ख्वाबों के चौरे
बुझने को
हैं
अब उत्सव के जलते दिये !
भोलानाथ
दूर रही दौलत की तितली
दौड़े बहुत ठिकाने छूटे
पीछे रह गये
रक्त के रिस्ते खेले कूदे ठौर !
केंचुल जैसा प्यार हवा में
सरल स्वांग फुरके
विष फुर्की मुख मुख
हेकड़ जलवा गिरगिट वाला दौर !
सीधा आंगन जाजम जाजम भृकुटी टेढ़ी
और न
थिरके पांव
पांव के साथ नचे नंगदांव बे ढर्रे टूटे घुंघरू,
बजते रहे मजीरे ढोल बंधी न फिर लय वैसी
शेष
बचा न भात भगौने
बासी मसले सेंक रहे रोटी सा भीतर घुमरू,
कान कान की खुसुर फुसुर
बतकही रही न
मांजे धोये बे पेंदी के
लोटों जैसा लुड़क रहे सिरमौर !
बाहर बहती हवा सूंघ के जीवित हुये कवर के
मुर्दे
ओढ़े कफन
कयामत वाली दफन त्यौरियां बांट रहीं तलवार,
राज्याचुत राजाओं की क्षेम क्षोभ पगड़ी पग
रौंद
निहत्थे हांथों
ईदगाह की शरण में पहने कूद कूद सलवार,
राजधरम की देश मुंनादी सुन सुन
सूखे ओंठ
हलक में हिंटका
बेल के जैसा पंजीरी का कौर !
आजाद बोल की पैरोकारी संसद सड़क चौराहे
गैल
गैल में
ठोंक छातियां बे भय खेले आग अंगारी फाग,
जलती दृष्टि झुलसते हांथ उंगलियां
विभत्स देह की
ओंठ मुसेसी चीख
सुने न कानन लपट लावनी घट पनघट की राग,
बंटवारे का पूत पड़ोसी छोड़ गया
औलाद यहां जो
प्रगति पंथ पथ
गोबर करती गाह रही हुड़दौर !
भोलानाथ
ऊंचे ऊंचे गगन छूते उठने दो
ऊपर ही ऊपर पूरा बबंडर
आकार
आंखों में अब तक उभरा नहीं है !
ऐसे समय में हता तुतु शिल्प गढूं कैसे
छेनियों की
धार धरा पानी
शिलाओं की छाती में उतरा नहीं है !
बेबड़ बर्रैयों के धुआं धुआं छत्तों की
सुन सुन के गुरतुर खबर में
गुबरैले गोबर की गोलियां
धकेल रहे साथ साथ मिल के,
अस्तबल तबेलों के मेलों की भीड़ सा
उमड़ रहे मनोबल तोड़ने
मरोड़ने
रूमे हैं रीढ़ में हठ धर्मी चींटों सा बिल के,
तरकस की तुक में है चौखट की दीमक
उधरती दीवारों की
गहरी
दरारों का रंग रूप रोगन बिसरा नहीं है !
मूंडे चढ़े मकड़जालों की पुख्ता सफाई का
समय नहीं चौकन्ना चौंकस हूँ
लक्षित
सिन्दूर की ताजा ताजा कोई खबर तो मिले,
अलग मुख मसौदों में समरस राग भरूं कैसे
चील
कौओं सा उड़ते
हवाओं में चर्चे बहुत हैं प्रलापों के चुभते गिले,
सेंधमारी में बहुतक चूहे जुटे लील जाने को
सूरज की
आभा
गलुओं की युति में सम्मानित अखरा नहीं है !
उठते धुआं में दिखते नहीं साफ धुंधले हैं
गिरगिटिया चेहरे
टूटे धुड़ो की
बड़ी हानियां पढ़ रथारूढ़ पग बीच पथ में रुके,
जख्मीं जंघाओं की पीड़ा आंखों में झलकी
शरणागति
ओंठ आरत
प्राणों की पा के बे शर्त फतवे अदब से झुके,
ठट्ठा ठिठोली सी अपनों की रेरी, जाहिल जहन का
पूरा
समुंदर
चुल्लू में डूबा बिगड़ैल लहजा सुधरा नहीं है !
भोलानाथ
लाचार बचपन द्वार द्वंदों के बीता
दीवार फांदी
न सेंध
सुंदर भवन के पिछवाड़े गुपचुप खुना !
पिघलता रहा लौह सा भट्ठियों में
ढल ढल के
बेढंग
नातों के सांचों में सूखे चनों सा भुना !
फूट पकते फफोलों ने अवसर
दिये ही नहीं
और आवारा भौरों ने उड़ उड़
खिलाया कली उंगली हम पर उठी,
उलझे उलझे सिरे छोर करघे के भीतर
देखा नहीं ताना बाना कभी
फिर भी
गाते कबीरी फिरे पीठ पीछे हठी,
उमड़ते रहे खूब संशय के बादल
बरसे न आंगन
पिछवाड़े सावन झड़ी सा
अफवाह उड़ती उनने बुना !
बे आग उठते धुओं की कालिख को
क्या देते शंख सी सफाई
तोड़ आये समय से
भरे मन जाजम के रंगीन धागे,
कबंधी रवायत का वह खाली खाली
सघन वन पूरा का पूरा
खाली हुआ
और भरते कुलाचें हिरण सबले भागे,
रामनामी के भीतर चील्हर सा चिपका
स्वारथ समझ बूझ
जलते दिये की
पेंदी को मन से किया अनसुना !
आगे नहीं कोई पीछे पड़ी लठमारी की
लठिया,भागे धुरी से
परिधियों के
बाहर,बचाये हया हम ठाढ़े अकेले,
पर्वों के उत्सव झमाझम सावन की
लय लोरी कजरी
शिवालय के अर्चन
फीके लगे हाट बाजार भीड़ों के मेले,
स्नेह वत्सल के दुलराये अंखुओं की
आंखों में बिंबित है
अब भी
अश्लीलता ने तन मन रुई सा धुना !
भोलानाथ
प्यार करते रहे हम जिन्हें
उम्र भर
रात
भर में वही बेवफा हो गये !
फड़फड़ा के उड़े घोंसलों के
अहम
और
उत्सव के क्षण में खफा हो गये !
नकचढ़ी त्योरियों की ईबादत से
ऊबे लिहाजों के भीतर रहे
नाक
छुरियों की चौरे चबुतरे बे गाये,
बेगैरत गुनाहों की गाई अलफ़ाज़ी
सुन सुन उनके आगे
ठाढ़े रहे मौन
अर्चन में गुमसुम गर्दन झुकाये,
रंगीन जिल्दों के भीतर की शायरी
बे
गाये
मौन मुख वाक़िये वफ़ा हो गये !
कारी कजरारी आंखों में आकंठ डूबे
देखे जो सपने
साकार
होने के पहले हवाओं सा बदले,
ऊंची ऊंची उड़ानों से लौटे नहीं
मिल गया होगा
बेहतर ठिकाना
तभी ले उड़े हैं अनुबंध सगले,
कसमें किये की दलीलें हैं
उनकी
अनुबंध
के हम कोरे सफा हो गये !
शिकवे शिकायत नहीं कोई उनसे
पछुआ में भीगें
या पुरवा नहायें
हममें ही कमियां रही होंगी कोई,
सामर्थ होते यदि फिर भी बैताली
प्रश्नों से कैसे बचाते
तन ओढ़ी
अपनी बेदाग इज्जत की रंगीन लोई,
वहम प्यार का पी बहके नहीं
बनते
बनते
रहवास उनके रफा हो गये !
भोलानाथ
खेल खिलाडी फुलवारी की बोंडी बोंडी खिलने दे कलियां खेल न असमत से माली ! राज महल की उठा धरी में मत मसल लतायें सींच प्यार से मत दे उपवन को गाली ! माना की इन उठते झंझावातों में तू कहीं नहीं था बेमन गले लगाना भी अपराध की श्रेणी में आता है, सोये जहन बेहोश देह पर बाहुबली के पीठों छापे मुह मुह प्रचलित किस्से शौर्य सरीखा भय बस निर्बल गाता है, छाती छुअन जांघ देख न देख देह की आग का जज्बा पोत न मुखड़ों कालिख काली ! आज जो बादल गरज रहे हैं नभ में कल नहीं होंगे जिनकी छाया बैठ ऐंठ के लाज का चीर हरण कर आँख तरेरे, अंधी आँख सबै सब काला चिल्लाचोंथी कान सुनै न मन की बात सुना मुह मिट्ठू जनहित उठती ऐंठन पेट करेरे, देह दाग सहयोग में दाग की लीपा पोती खिर खिर हवा में बिखरी दाग की लाली ! पकड़ न तितली उपवन उपवन मींज मरोड़ तोड़ पंख न उड़ने का संबल दे हवस के चूल्हे रांध न खिचड़ी सेंक न रोटी, सात घरों को छुये न डाईन भरे पेट की भूखी काया की हलचल ने काटा है विश्व पटल पर घर मुर्गी की बोटी बोटी, बेनथ नाकों रस्म निभी न उँची नाक सुकन्याओं की नोच नहीं कानों की बाली ! भोलानाथ
खेल खिलाडी फुलवारी की
बोंडी बोंडी
खिलने दे कलियां
खेल न
असमत से माली !
राज महल की उठा धरी में
मत मसल लतायें
सींच प्यार से
मत दे
उपवन को गाली !
माना की इन उठते झंझावातों में
तू
कहीं नहीं था
बेमन गले लगाना भी
अपराध की श्रेणी में आता है,
सोये जहन बेहोश देह पर
बाहुबली के पीठों छापे
मुह मुह प्रचलित किस्से
शौर्य सरीखा
भय बस निर्बल गाता है,
छाती छुअन जांघ देख न
देख देह की
आग का जज्बा
पोत न
मुखड़ों कालिख काली !
आज जो बादल गरज रहे हैं
नभ में कल नहीं होंगे
जिनकी छाया बैठ ऐंठ के
लाज का
चीर हरण कर आँख तरेरे,
अंधी आँख सबै सब काला
चिल्लाचोंथी कान सुनै न
मन की बात सुना
मुह मिट्ठू
जनहित उठती ऐंठन पेट करेरे,
देह दाग सहयोग में दाग की
लीपा पोती
खिर खिर
हवा में
बिखरी दाग की लाली !
पकड़ न तितली उपवन उपवन
मींज मरोड़ तोड़ पंख न
उड़ने का संबल दे
हवस के चूल्हे
रांध न खिचड़ी सेंक न रोटी,
सात घरों को छुये न डाईन
भरे पेट की भूखी काया की
हलचल ने काटा है
विश्व पटल पर
घर मुर्गी की बोटी बोटी,
बेनथ नाकों रस्म निभी न
उँची नाक
सुकन्याओं की
नोच
नहीं कानों की बाली !
भोलानाथ
गुरु पद वंदन परम्परा की
कंधे कांवड़ बोझ उठाये
लसक
नाचता आंखों का उल्लास !
दीन हीन दुख दैन्यता बुद्धिमता के
द्वार पर
पन्नी
पुट्ठे बीन के तोड़ रही उपवास !
अक्षर से अनजान गुरू पढ़ रहे
लिलार लकीरों का अनुवाद
हिचक बिन
लंगड़े तारक मंदबुद्धि गुण हीन,
रामायण में अनुभव अपना लिख गये
तुलसी
दंडवती मुद्रा में
पलेंगे पिछड़े हो के ज्ञान प्रवीण,
भक्ति भाव की उत्तम ताड़ी पी पी
जी गये पुरखे
हस्तांत्रित
कर गये रिवाजों का इतिहास !
पाखंडों के शिलालेख की बे समझी जो
थिरक रही है
उतरी नहीं
जहन से और बढ़ी दिन दून खुमारी,
हंक रहे प्रपंची बाड़ों में गाडर के
अनुरूप
दिखा न तोरण
मोक्ष द्वार का बुझी मशालें सारी !
दिया दिखाते पदचिन्हों का वाजिब
अर्चन किया नहीं
बस
सहा सियारी हुआ हुआ संत्रास !
रोजी से नित रोजा हैं बे रोजी पट बंद
गुरुमुख
भरी पान की पीक
चेलाने गाभिन गाय सा खांसें,
भूत भविष्य के वक्ता वर्तमान की
ताल तलैया
उड़ती धूर की
मरी मछलियां मुख जालों में फांसे,
झांसों के सावन में झूल न झूले
काढ़
सके तो
काढ़ वक्ष में धंसी युगों की फांस !
तय किया है बहुत कुछ अभी शेष है
जिंदगी का सफर
चलते रहना है कहना है
उस छोर की आखिरी आखिरी !
आगे कुआं पीछे खाई की काढ़ी हैं फाँसें
काढ़े
कढ़ी न कनिष्ठा के
उस पोर की आखिरी आखिरी !
वक्त भी है अभी सांस भी स्वच्छ है बूढी
बांहों के
बूढ़े नहीं हौसले
कद से ऊपर हैं संझा की परछाईयां,
फिरे गाते फकीरी प्रभाती सुबह की
कानों न रेंगे जुआं
मुंह ढक के सोये
सिरों के सिराने खुदती रही खाईयां,
गुलामी के बख्तर से बाहर निकल
अब वतन के लिये
भांप गैंती शिलाओं के
उस शोर की आखिरी आखिरी !
होश हीन भीतर का अभिनय हैश्राप बंधु
बंधुआ संवेदन का द्वार खोल
धुंध बहुत
गहरी है घड़ी नहीं और अब विलास की,
कंटकों के बीच घिरी जिंदगी कुछ तो
आसान कर
कामयाब हुये वही जिनने खोखले
रिवाज की रीढ़ में पांव पथ तलाश की,
जी हुजूरी का व्यूह तोड़ गर्दिश में
गांव है
दे दे पैगाम उन्हें
उस गैल खोर की आखिरी आखिरी !
भाग नहीं सिद्दत से जूझ इस आड़े वक्त से
बैठेगा कब तक मन मार के
कसालों का बंदर
कूदेगा डार से एक दिन जरूर,
खड़े होने की कोसिस तो कर लहु पोषित
आदर्शों का रंगीन अजगर
राह छोड़ भागेगा
चौकड़ियां भरते शावकों से दूर,
कर भरोसा धुकधुकाती नब्ज पर
निर्बल नहीं
यह बंधा बैल है
सरफूंदी खोल डोर की आखिरी आखिरी !
भोलानाथ
आई रे आई बदरिया आई रे आई
जूड़े में
पछुआ
आंचल में लहरे लहर पुरवाई !
आई रे आई !
प्यासों को पानी नदी ताल झरनों का
शैशव अल्हड़ लौटाने
परती धरा में पलते चराचर की दादी
बुआ सा रस्मे निभाने,
सरग चढ़ बिजुरिया कंठ कजरी ले आई !
भौंरों सा काले घने गेशुओं में दुबका है
नभ पूरा पूरा,
उतंगी शिखर गर्जनाओं में छूटा हाथों
का बजता तमूरा,
झलती रही बिजना बाहर अमराई !
बंधे बगिया बगीचों में फिर अबकी सावन के
रंगीन झूले,
ये री बागी बदरिया ठहर ठहर खोंपा ठहर
मजा मेले का ले ले,
तट छोड़ नदिया चौके चबुतरे चढ़ आई !
भोलानाथ
हमको सजा देने वाले,
यह मेंहदी की रंगत
रह रह दिखा न
पुस्तैनी मसनद नहीं है तुम्हारी !
पुस्तैनी मसनद नहीं है तुम्हारी !
आजाद हम हैं निराले
हमको सजा देने वाले !
अपने गुनाहों की कालिख लिलारे
लगा न
प्रपंची हवाओं की
सह पा के बेरों ने मूड़े की पगड़ी उतारी !
पुस्तैनी मसनद नहीं है तुम्हारी! भ्रामक मंसूबे पाले
हमको सजा देने वाले !
परैयों का पारा नहीं है कजरौटी अमाया
यह बासी काजल
लगा दाग
बे पानी छूटेगा कैसे धोई धवल लोई का,
चूसी चबाई गडेरी का चौके में बगरा है
छीलन
रमी चींटियां हैं
समझेंगी क्या आंधियां दर्द पतरोई का,
उज्जैनी के तारतम्य स्वांगों ने
तर्कों के बूते
क्षिप्रा के घाटों की
अलका सी रौनक हंस हंस उजारी !
पुस्तैनी मसनद नहीं है तुम्हारी !
मत फेंक बे घाट जाले
हमको सजा देने वाले !
उलटी दिशा में मोड़ नहीं बसी भूत
प्यास के बहने दे नदियां
निश्चित गंतव्य में
मन ही गंगोत्री सा उदगम उदगार है,
बे मेल छोरों के बंधन लिये, फेरों सा
मन के अनुबंध नहीं होने हैं
केवल
छद्मी तजुरबों का छना हुआ व्यापार है,
साबित करें कैसे सच तू ही बता
जतवों का पीसा
कलेवा में राँधा
बचा खुचा बासी है रात की बियारी !
पुस्तैनी मसनद नहीं है तुम्हारी !
हंडिया क्या कुछ उबाले
हमको सजा देने वाले !
ऊंचे उड़ते अहम की खुमारी लिये
किये पाप तुमने जो
दाखिल किया क्या कोई व्यौरा यहां
या मुकर्रर किया है कोई सजा,
हम से ज्यादा गुनहगार तू है हमारी खता
आत्म रक्षा की थी
चूक तुमसे कैसे हुई
पास तेरे थी सबसे ऊंची ध्वजा,
धमकी धमनियों में रख अपने,घुड़की के
आदी नहीं हैं
लक्ष्मण के
किरदार में रात वन की अकेले गुजारी !
पुस्तैनी मसनद नहीं है तुम्हारी !
देखे अधम गोरे काले
हमको सजा देने वाले !
भोलानाथ
आत्म हंता सा गुजरा है जीवन
छुपाऊं
धांधर में अपने
जाहिर किया है छपा के अखबार में !
लीपा पोती किये घर का थूंका खखारा
जूझे जहन से
मथ खारा खारा
सायद फलित हो निथारा घरबार में, !
गंगाजली नेह की ढार सींचा जिन्हें वे
बिच्छू के
बच्चों सा
मनमानी रेंगे भाव बंधन सभी तोड़ के,
रुच रुच के रोपे हृदयं जो आंखों के सपने
सपन हुये
खोजा
टटोला सिराने फिर देखा टूटे सिरे जोड़ के,
अकारथ हुआ प्राण में प्राण का फूंकना
होम हो हो के
पढ़ता
रहा हूं अल्हैती फतह उनकी हर हार में !
हारे थके हौसलों को संजीवनी का ताजा
उतारा
जब तब पिला के
जिगर में लक्ष्य भेदन का जज्बा जगाया,
सुख के क्षणों की आहुतियां दे दुख की
दरी ओढ़
गीले बिछौने की
रातों में छपका के छाती उनको सुलाया,
पंख होते उड़े लाल मटकी का चुग्गा
भर भर अंजुरियों
बुलाता रहा
फिर भी लौटे नहीं अपनी इस डार में !
ढलती संझा में बुझने को है यह दिया
तेल बिन
सूखी बाती की
लहराती लौ जल रही अब तलक भीख में,
चिल्लाचोथी में जाया किया वक्त खाली
हथेली की आवारगी
अपने
बस में रही न हवाओं के झोंके चले सीख में,
कूड़ेदानों में फेंका कचरे सा किरदार अपना
आडा
अवरोध
ठहरा निर्मल नदी की बहती प्रखर धार में !
भोलानाथ
पहरे में ठहरो पहर
लम्हे
ठाढ़ी रहने दो
बाहर द्वार के आज पूनम की इस रात को !
काली घटाओं की छाया में प्यासे पपीहे सा
लौटा है परदेशी
रिमझिम
झमाझम बरसने दो स्वाति बरसात को !
गोमट चुनरिया की आंचल बंधी है,विरही
तपन की काया जली
लेप मरहम चुपरते
बे बात बीते न मनसुख बहारों की सुर्खाब रैना,
ओरगाव की आग के उपले सा दिन रात सुलगे
जले हैं महमहाया है
तब यह सिंधौरा का
सेंधुर अंजे कोर काजल गुलाबी ये नैना,
सुधियों के जंगले झरोखों की चंचल हवा
झूला झुलनी झुला के
रह रह
रिझाये उकसाये भीतर दबे तात जजबात को !
द्वन्द गुंफित व्यंजना की कैसे कहूं,वक्ष की
प्यास करती रही मसखरी आंख से
जाया
होता रहा वक्त बढ़ता रहा ताप इंतजार का,
पर्ची परख पढ़ मेरे जिया की मुझ पर भी
एक अहसान कर छोटी है ख्वाहिश,
हाँ तेरी बड़ी है
दे वक्त इतना पूरा हो कोरम श्रंगार का,
बेलिया द्वार तोरण की सांसों में महके
उम्र भर के लिये
नया रचने दे
इतिहास प्यासे दिलों की मुलाकात को !
मेरे चाहत की मंजिल चाहत से होकर शुरू
संझा बाती की
अंतिम लौ पर खत्म हो
कर पूरी मंशा देखा जो मैने जीते जी ख्वाब रे,
व्यापे बिरह न बढ़ें दूरियां गलबहियों रहें हम
सदा साथ
पानी पानी सा मिल के
एकांतिक पलों के सुख से भरे हों नयन बावरे,
सजती रहे रोज वैसी ही यादें जैसे छज्जे
अंटरियों में
चढ़ चढ़
की ताका झांकी द्वारे लगी उस बारात को !
भोलानाथ
फूल रोपते उम्र बढ़ानी
महल अटारी
लाचारी के
हिस्से आई बेर मोकईयों वाली बाड़ !
नीम बकायन का गठबंधन खोज रहा है
चंदन वन में
विषधर चेहरे
गा कर भव मंथन की नई नवेली आड़ !
सुलगी कहां परोली आग उठी चिंगारी
भभक कहां विकराल हुई
तेज लपट में
जले पड़ोसी खाक हुये आंखों के ख्वाब,
घरफोड़ू सब चोर उचक्के भोंक रहे
आकाश देख कर
गिले गिनाते टूट गिरे
ध्रुव तारा सायद बदलें लोक धर्म वर्ताव,
ताजोतख्त विरोधी गतिविधियों से आगे
देश विरोध में
दुश्मन देश की
ड्योढ़ी पर है वफा का चोला फाड़ !
दगा सगा न हुआ किसी का भांप इरादे
विषम स्वरों के
स्वच्छ हृदय के बोल नहीं ये
हिंदी हिन्द जलाते छद्म का हिस्सा है,
पटकथा पुरानी पढ़ने वाले पढ़े लिखे सब
लोग नये हैं
कहा सुनी विस्तार प्रपंची
उगले जुमले मनभेदों का किस्सा है,
परकटी चील की चीख हवा में सपन
उड़ानें
नब्ज टटोली
यात्राओं की पीर समानी पकी देंह की हाड़ !65
सीमाओं के अवरोध फांद पद पूजक हृदय के
मन्त्र निराले
बलशाली हैं
राष्ट्र विरोधी पलक पालकी ढोने वाले कंधे,
मीम भीम गठजोड़ नहीं बीमारी है घर घर
अलगाववाद की
वोट बटोरी
भंगचढ़ियों के गिरोह गिरह हैं अकल के अंधे,
व्यामोहों में भोंक रहे जो अवसरवादी
कुनवे
कपट कपाली
पाली फितरत उगले जहर न औटे खांड !
भोलानाथ
केहि विधि पूजूं
बता दे
समझ परे न कछु
जहन जगा झट माई रे !
ओ माई रे !
होम हवन के मन्त्र न जानूं
पूजन अर्चन
वैदिक
विधि सम्मति गहराई रे !
ओ माई रे !
कष्टों के अम्बार लगे हैं
दिन अब वो न रहे
बहुत सहा
कुछ कहा नहीं दर तेरे,
शक्ति नहीं है भक्ति की
मुझमे
अधीर हृदय है
हौले हौले उतरे आंख अंधेरे,
गंगा नहलाऊं या चुनरी
ले
आऊं
पग पांव जले परछाईं रे !
ओ माई रे !
दे के दरश क्यों दूर हुई है
आशीर्वचन
धरोहर
झंझाओं में उजड़ी है,
पतरोई सा उड़े तुम्हारी
छाया से
त्रुटियों के पुतले
स्वीकार क्षमा मा खड़ी है,
बादल सा बरस एक बार
झमाझम
उल्ह हरी हो
यह जीवन की अमराई रे !
ओ माई रे !
मां तेरे मुखड़े के आछादित
आलोक के
आलोकित
वह खप्पर खड्ग नहीं बिसरा,
बस विनय प्रार्थना चरणों में
है इतनी
आलोकित कर
दिल जैसे गजल का मिसरा,
पांय परों कर जोरि कहौं
फिर
फिर
अइयो जस नवरतियों में आई रे !
ओ माई रे !
भोलानाथ
गीत लिखा न गाया
बहुत बिराया
भरी दोपहरी
जुगनू की लीलायें गा कर हरदम धन्य हुये !
बेतुकी कहन तशतरी में रख कर विज्ञापित
करने वाले
निज स्थापन की
युति में अंजुरी ओलिया भर भर पुन्य हुये !
प्रायोजित तिकड़म के सूत्रधार तुम मन से
मन तक स्वच्छ नहीं हो
मुंह भर बात
पेट भर आगी बे मतलब की फटे बांस सी राग,
नामी नाम हाशिये पर हैं चिल्हर के कनफोर का
कोई मोल नहीं
बिरहा गा कर
सावन का क्यों खेल रहा है फागुन वाली फाग,
पढ़े न पोथी फाड़े पन्ने मंद बुद्धि की कुंद
सोच
सुकराती प्याली
भरा लबालब जहर पिलाया मुजरिम अन्य हुये !
चोटी चोटी पर्वत फतह जो कर सकते थे उनके
सम्मुख
गारा गिट्टी बजरी बालू
नन्ही मुरुम मिला कर सरग छुई दीवार चुना दी,
बंधे पटौती ग्रंथ न पलटे व्यास पीठ पर मुहर
लगाते नाम की अपने
गोकुल गोविन्द
कहते कहते लाल किले की कथा सुना दी,
बड़े विसर्जन की तैयारी में पुरे फूल मकरंद
महक के झरे
परागी
भ्रूण हवा में सभी निषेचन जन्य हुये !
सड़ी धरोहर असह गंध मत बेच इतर के मोल
भरी नाक गुण धर्म न समझे
झूठ मूठ
अब और नहीं ब्याध व्यथा सब सच्ची सच्ची पढ़,
धूमिल धूमिल वर्तनी पुस्त पुराना आँखों का
अभ्यास,चेत अभी भी वक्त है
नई
शिला के वक्ष में भाव भंगिमा वर्तमान गढ़,
ताड़ चढ़े हिम्मत के तोते किस अभियान में
उड़ते
सावन का उपवास
न टूटा जल भरे बिलों के दान अनन्य हुये !
भोलानाथ
राजा अंधा प्रजा है गूंगी
पेट पकड़
बाजार में बिलखे
ठंडे चूल्हे देख देख कर रोये !
छप्पनगजी गपी गणनायक
कोषागार का संचित कोष
विदेश की
परती धरती कौड़ी कौड़ी बोये !
सेवा निवृत वेतन वृति ठिठोली
आधी अधर हंसी भर
पिचके पेट
पांव बल चेपे देह गुलेल सा खींचे,
भरे पेट अनुदानी अन्न हुआ बाजारू
भ्रष्ट व्यवस्था
कचरे खौंदे
जमाखोर जड़ जतन से सींचे,
ठंडी ठंडी अलख अशांत हृदय की
सुने नहीं
बगदरी आकलन
ओढ़ बे कलथी कुम्भकरण सा सोये !
जंतर मंतर की बूढ़ सभा में छलका
दर्द बाढ़ सा
बहा छलक
परनालों में पर कान जुआं न रेंगा,
आंड बांस दरबारी कसरत के अनवरत
प्रयासों का
ढब
हरदम दिखा दूर से आंख घमंडी ठेंगा,
खंडित नीव के नव निर्माणों में
खपी
जवानी जिनकी
उनके कौशल कीरत कब के पोंछे धोये !
गुड़ की ढेली देख चींटियां खड़ी भीत
चढ़ बे उपचार मरी
कुछ
और अभी जीवित हैं बे खाये बीमार,
भात भगौनो पर हैं गली गली के कुत्ते
काबिज
सिंहासन की
सौगातों पर खड़ी किये ऊंची दीवार,
भर उम्मीदेंआंख लबालब स्तुतियों में
बरसों
बरस
अकारथ तन के कुछ बचे खुचे दिन खोये !
भोलानाथ
हवा भोग पर जीवन यापन
चूल्हे चढ़ी खीर सा
कान उबलती
सुबह शाम की झिड़की !
श्मशान परस्ती पांव पलंग पर
बेबस हांथ
खुले न खोले
आय की दूजी खिड़की !
भीख कटोरा बसर जिंदगी का
मीठा अहसास
फर्ज की रद्दी में
बेले पापड़ सा किरचा किरचा टूटा ,
भरी जवानी के उपक्रम का कोई
मोल नहीं अब
कोल्हू बैल सा
पकी पसुरियां तब सोता यह फूटा,
चुगे खेत बे चुग्गा क्यों कर नेह
निभाये
डोर नात की
तोड़ रही नकचढ़िया पिड़की !
उंगली गिने हैं कारक रक्तचाप के
फिर भी
ढोंग परस्ती आदत
प्रश्नों पर है उत्तर से अनजान,
अंध अबूझी गहिर कुआं सी
बंद पहेली बे संघर्ष न उगले
हलक में
अटके रोटी कपडा और मकान,
हवन हवाले समिधा छाल तिन्दुहरी
जैसे
जली आस्था
तिनगी तिनगी असमय तिड़की !
हाथों हाथ रहे न छूटे सब मझधार
तिनके जैसी
बहे जिंदगी
केवट का किरदार निभाये शहरी बाबू,
घाट बाट तट धुआं धुआं दिशा शूल सा
भ्रम गहराया
हक्का बक्का
बिचलित मन का संशय हुआ बेकाबू
निपट अकेले थे मेले में अब भी
रहे अकेले
थके न
हारे सुन सुन उनकी हिड़की !
भोलानाथ
रक्त बीज सा असुर बढे
सिर छेदन को
अबकी
रण में नहीं हैं दुर्गा काली !
आदर्श राम शिव श्याम की
स्तुति का संबल
अर्जित कर
हर भय कठिन नहीं रखवाली !
घर बाहर स्कूल अदालत हाट
बाट वन फिरें फिदाइन
बेवजह तने तन
धौंस कान में अब भगवा की बारी,
नीच ऊंच सर्वोच्य न्याय के जहन
जहन्नुम वाले
ख्याल धतूरे जैसे
लगे फूलने केशर की फुलवारी,
मत बांध बिदकने दे नंदी को
गाड़
न खूंटे
रहने दे गांठ गिरैयां खाली !
बिधने दे ब्याधों को अभ्यारण में
नभ उड़ें कबूतर
फिरें बेबाधा
लावा तीतुर जियें जगत उँजियार ,
आरण्य विचरते नहीं असुर अब
ऊंचे ओहदे बैठ गरजती
अहम
आवारा निष्ठा पर घोंप रही तलवार ,
अनुसूचित जन सूची से बाहर
आ कर भी
दोमुहे
फांकते पंजीरी भर भर थाली !
दिल धरी आस्था भरी लबालब
घट घातों के ताना बाना
बुन रहा निरंतर
जुदा सिरों का जुदा जुदा गठजोड़,
गिद्धों की बारात में आगे आगे
नाच न भैया
अग्नि पथों की राख लोट न
नये नये पगचिन्ह छाप कुछ छोड़,
बिगड़े बोल बिरोध नहीं
बारूदी बंकर में
बीड़ी
सुलगाते दिख रहे सवाली !
भोलानाथ
अर्थाते अच्छा बुरा वक्त कैसे
आते जाते
लम्हों का
गाया वही जो जिया !
सच बांधा शब्दों में ओंठों की
जागी
अलख
सुप्त कानों ने जाया किया !
बहरी गूंगी हलक ओंठ बक्कुर के
शोते धरे
अखरा
अखरा भाषा की नदियां बहाया,
जाली जगलों में जन्मों की
जमी धूल
गर्दिश का
गर्दा फूंक फूंक मुंह से उड़ाया,
भरी भीड़ मेलों में अनगिन
तमाशों के
क्षत्रप तले
भाव पूरित जलाया दिया !
आंखों देखे खुलासों का घाटा
बाढ़ा लिखा
बही खाता
खंगाला क्या खोया पाया,
दुख दर्द के बगरे पर्चों में
छपने के लायक हैं
जैसे
ठाठ ठहरा धुआं मचमचाया,
अद्धी बीड़ी सा खोंसे कनपट
कलम
कट रही
शर्द रातें ओढ़े ओछी कमरिया !
सुलगती रही आग भीतर ही
भीतर
उठता धुआं नभ
बहती व्यारों ने मक्खन सा लीला,
संकरे की बेबस बिलैया सी
कविताई के
ताने
बाने में रोड़ा है धागा गंठीला,
मौसम बदलते युग भ्रांतियों का
उगला
हलाहल
शिव जी के जैसा हमने पिया !
भोलानथ
बांध दिया रे बांध दिया घंटी
ठाढ़ी है
भौंचक मुंडेर की बिलैया !
साहस नहीं देख दुःसाहस
मूंस की
उबाल में है गांव की तलैया !
भंडाभेर गुलमछरियों के
द्वंद में
दहिया महिया है
भंड़री तलैया का पानी,
बिलबिलाती गहरे में सहमी
मछलियां
लिखने लगीं
घाट की भूली बिसरी कहानी,
रांध लिया रे रांध लिया
दाल
दिया देख सीझी परैया !
बार बार प्रस्तुत प्रस्तावों की
विफल
चर्चनाओं के
कोरम रहे आधे आधे,
कह वक्त तू ही अपने इरादे
परे
कल्पना के
रहे लक्ष्य कैसे पुस्तों के साधे,
उन्माद जिया रे उन्माद
जिया
थिरक रहे ठाठ के नचैया !
कृत्यों कुकृत्यों का त्याग कर
हज को जाये
न जाये
छोंड़ छप्पर की यह पहरेदारी,
रुकनी नहीं है कुतरती रहेगी
जड़ें आस्था की
गोबर
गणेशों की मूसक सवारी,
जिहाद हिया रे जिहाद
हिया
जिये देह दंश उड़ती बर्रैया !
भोलानाथ
नहीं हुये स्वीका
रहा अनजान
बाटिका दिया जलाते
शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता !
प्राण वार अंकवार गले अब
वक्ष से वक्ष नहीं मिलते
शहद ओंठ
झरनों सा है मसखरी का नाता !
अपनी हांक गिराने वाले साख
और की टिके न धरती पांव
उड़े
अनजान हवा में टूटे तृण के लेखे,
शब्द खेल की प्रभुताई का अंधा
गुरूर गिर गया रपट के
फिर भी पासे
उलट पलट के चली चाल के देखे,
ब्रम्हवंश के मोह में फेंके ब्रम्हफाँस के
बंधन में
टिड्डे सा
हर प्रातिभ तड़प तड़प मर जाता !
घुड़दौड़ में अब्बल भले ही हों हम
खच्चर का संबोधन पा कर
गली के
कांटों जैसा हरदम गये हटाये,
जोर बटोरी मुंहजोरी की धन्नासेठी
चोरी चोरी इस उसकी
गा कर
सोहरत अपनी जन जन शहर रटाये,
कान पटे उपदेशों का सारा निचोड़
निमुआं रस जैसा
दूध
नदी के मुहाने बूंद बूंद टपकाता !
सौंदर्यबोध की मुख्य धुरी से बंधे
प्राण
मदहोश भ्रमर सा
गिनते गांठें रमे रहे कुचबंधों की,
रत्ती भर युगबोध जिया न जिनने
उनकी
उंगली ही उठती है
पीर न जानें दोहरी पीठ पके कंधों की,
बौरे नहीं भरी भीतर मक्कारी
हर हर गंगे का
केवल जयकारा
रपट परे मन मोक्षदायिनी गाता !
भोलानाथ
चाक़ू चाबुक भाई चारा
सच्ची सच्ची सीख
समझ न आई
जिगर जिया में पलती रही बिमारी !
उपयुक्त नहीं अब मरहम का उपचार
वैद्य जी
काढ़ा मिश्रित दिव्य रसायन
भर भर घोंटा घोंघा डारो सारी!
विषम विषाक्त जहन से निकले
पिघले सायद
धीरे धीरे पाप परत की
पीड़ा दायक परी हृदय की गांठ,
दशकों का यह मर्ज पुराना
अँकबार भरे है
तन मन जैसे
दूध दही का सींका बंधा पुरानी ठाठ,
बौनी कूद कुलांचों की कोंची
हर कोशिश
देहरी द्वार पटौती आले
विष बुझी बूटियां घिस घिस हारी !
दांत तोड़ती मुक्कों जैसीआह
हलक की
सुई चुभन सी बिधी कलेजा
दया धर्म निर्पेक्ष आड़ सब छोड़,
कदमताल ड्योढ़ी का भभ्भड़
विस्फोटक बर्ताव के
बहते घाव का गुल्ल्क
खुद के बूते ठाढ़े ठाढ़े फोड़ ,
गुलुर गुलुर बतकही के मोहक मर्मी
मुस्कानों के जाल फेंक न
भींच
मुट्ठियां तोड़ किवाड़े भय के भारी !
धुरी बंधे हैं माह प्रहर दिन
रोग विथा के
चुटकी चूरन उपयुक्त नहीं
गहन शोध के विषय वस्तु हैं ये,
बांस चढ़े नट जैसा केवल
पात्र नहीं करतब के
उस्ताज तपी
तन हंता मन क्रम वचन तथास्तु हैं ये,
हूरों वाली जन्नत के तलबगार
बह रहे
तिलिस्मी सुर्रा में
जानें कैसे तालीमों की नातेदारी !
भोलानाथ
और हैं न शामियाने में
चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
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जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं उस दूर दराजी प्रीतम को यह संदेशों की पाती ! हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित तू ही बनजा दूत रे बदर...
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जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...