Monday, 29 December 2025

ऊंचे ऊंचे गगन छूते उठने दो

ऊंचे ऊंचे गगन छूते उठने दो
ऊपर ही ऊपर पूरा बबंडर
आकार
आंखों में अब तक उभरा नहीं है !

ऐसे समय में हता तुतु शिल्प गढूं कैसे
छेनियों की
धार धरा पानी
शिलाओं की छाती में उतरा नहीं है !

बेबड़ बर्रैयों के धुआं धुआं छत्तों की
सुन सुन के गुरतुर खबर में
गुबरैले गोबर की गोलियां
धकेल रहे साथ साथ मिल के,

अस्तबल तबेलों के  मेलों की भीड़ सा
उमड़ रहे मनोबल तोड़ने
मरोड़ने
रूमे हैं रीढ़ में हठ धर्मी चींटों सा बिल के,

तरकस की तुक में है चौखट की दीमक
उधरती दीवारों की
गहरी
दरारों का रंग रूप  रोगन बिसरा नहीं है !


मूंडे चढ़े मकड़जालों की पुख्ता सफाई का
समय नहीं चौकन्ना चौंकस हूँ
लक्षित
सिन्दूर की ताजा ताजा कोई खबर तो मिले,


अलग मुख मसौदों में समरस राग भरूं कैसे
चील
कौओं सा उड़ते
हवाओं में चर्चे बहुत हैं प्रलापों के चुभते  गिले,

सेंधमारी में बहुतक चूहे जुटे लील जाने को
सूरज की
आभा
गलुओं की युति में सम्मानित अखरा नहीं है !

उठते धुआं में दिखते नहीं साफ धुंधले हैं
गिरगिटिया चेहरे  
टूटे धुड़ो की
बड़ी हानियां पढ़ रथारूढ़ पग बीच पथ में रुके,



जख्मीं जंघाओं की पीड़ा आंखों में झलकी
शरणागति
ओंठ आरत
प्राणों की पा के बे शर्त फतवे अदब से झुके,

ठट्ठा ठिठोली सी अपनों की रेरी, जाहिल जहन का
पूरा
समुंदर
चुल्लू में डूबा बिगड़ैल लहजा सुधरा नहीं है !


भोलानाथ 

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