आत्म हंता सा गुजरा है जीवन क्या कुछ
छुपाऊं
धांधर में अपने
जाहिर किया है छपा के अखबार में !
लीपा पोती किये घर का थूंका खखारा
जूझे जहन से
मथ खारा खारा
सायद फलित हो निथारा घरबार में, !
गंगाजली नेह की ढार सींचा जिन्हें वे
बिच्छू के
बच्चों सा
मनमानी रेंगे भाव बंधन सभी तोड़ के,
रुच रुच के रोपे हृदयं जो आंखों के सपने
सपन हुये
खोजा
टटोला सिराने फिर देखा टूटे सिरे जोड़ के,
अकारथ हुआ प्राण में प्राण का फूंकना
होम हो हो के
पढ़ता
रहा हूं अल्हैती फतह उनकी हर हार में !
हारे थके हौसलों को संजीवनी का ताजा
उतारा
जब तब पिला के
जिगर में लक्ष्य भेदन का जज्बा जगाया,
सुख के क्षणों की आहुतियां दे दुख की
दरी ओढ़
गीले बिछौने की
रातों में छपका के छाती उनको सुलाया,
पंख होते उड़े लाल मटकी का चुग्गा
भर भर अंजुरियों
बुलाता रहा
फिर भी लौटे नहीं अपनी इस डार में !
ढलती संझा में बुझने को है यह दिया
तेल बिन
सूखी बाती की
लहराती लौ जल रही अब तलक भीख में,
चिल्लाचोथी में जाया किया वक्त खाली
हथेली की आवारगी
अपने
बस में रही न हवाओं के झोंके चले सीख में,
कूड़ेदानों में फेंका कचरे सा किरदार अपना
आडा
अवरोध
ठहरा निर्मल नदी की बहती प्रखर धार में !
भोलानाथ
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