Monday, 29 December 2025

आई रे आई बदरिया आई रे आई

आई रे आई बदरिया आई रे आई
जूड़े में
पछुआ
आंचल में लहरे लहर पुरवाई !
                       आई रे आई !

प्यासों को पानी नदी ताल झरनों का
शैशव अल्हड़ लौटाने

परती धरा में पलते चराचर की दादी
बुआ सा रस्मे निभाने,

सरग चढ़ बिजुरिया कंठ कजरी ले आई !

भौंरों सा काले घने गेशुओं में दुबका है
नभ पूरा पूरा,

उतंगी शिखर गर्जनाओं में छूटा हाथों 
का बजता तमूरा,

झलती रही बिजना बाहर अमराई !

बंधे बगिया बगीचों में फिर अबकी सावन के
रंगीन झूले,

ये री बागी बदरिया ठहर ठहर खोंपा ठहर
मजा मेले का ले ले,

तट छोड़ नदिया चौके चबुतरे चढ़ आई !

भोलानाथ 

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...