आई रे आई बदरिया आई रे आई
जूड़े में
पछुआ
आंचल में लहरे लहर पुरवाई !
आई रे आई !
प्यासों को पानी नदी ताल झरनों का
शैशव अल्हड़ लौटाने
परती धरा में पलते चराचर की दादी
बुआ सा रस्मे निभाने,
सरग चढ़ बिजुरिया कंठ कजरी ले आई !
भौंरों सा काले घने गेशुओं में दुबका है
नभ पूरा पूरा,
उतंगी शिखर गर्जनाओं में छूटा हाथों
का बजता तमूरा,
झलती रही बिजना बाहर अमराई !
बंधे बगिया बगीचों में फिर अबकी सावन के
रंगीन झूले,
ये री बागी बदरिया ठहर ठहर खोंपा ठहर
मजा मेले का ले ले,
तट छोड़ नदिया चौके चबुतरे चढ़ आई !
भोलानाथ
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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