Monday, 29 December 2025

और हैं न शामियाने में

और हैं न शामियाने में 
लोग बाग
ले रहे मजे जो 
औरों की दाद का!

नक्कारखाने में 
चर्चा नकार की 
चिंतन है 
गीत नवगीतों के वाद का !

स्वांतः सुखाय का यह 
दस्तवेज नहीं 
चिंतन है युग युगीन 
स्वच्छ सरोकार का,

समझा न जाना उन्हें 
महिमा मंडित किया 
जिनने पढ़ा नहीं
पाठ संस्कार का, 

बे बजह औरों के 
पंजीबद्ध 
प्रकरण में 
पढ़ते हैं मुद्दा परिवाद का !

लक्षणा हैं व्यंजना हैं 
व्याकरण के रिश्ते से 
महामहिम 
पाणिनि के पुरखे हैं,

मुर्रों मुरैठों की कलगी के 
गिद्ध पंख 
तुर्रे तीर धनुष 
जी भर के  कुरखे हैं !

गुड़मारी लीले खाली पेट 
भूल गये 
भोथिल मुंह जायका 
गुड़सकरी स्वाद का !

हो जाते बड़े और छोटी बात 
कह के 
बड़ी बात बोल के धनी 
हुये बहुत छोटे,

उछाले जो सिक्के सरग  में 
आते आते 
धरती में वापस  
हुये  सगले  खोटे, 

बाजार मेलों रेरी लगा के 
मदिरा सा 
बिकता नहीं है 
तिकड़म फसाद का !

भोलानाथ

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