प्यार करते रहे हम जिन्हें
उम्र भर
रात
भर में वही बेवफा हो गये !
फड़फड़ा के उड़े घोंसलों के
अहम
और
उत्सव के क्षण में खफा हो गये !
नकचढ़ी त्योरियों की ईबादत से
ऊबे लिहाजों के भीतर रहे
नाक
छुरियों की चौरे चबुतरे बे गाये,
बेगैरत गुनाहों की गाई अलफ़ाज़ी
सुन सुन उनके आगे
ठाढ़े रहे मौन
अर्चन में गुमसुम गर्दन झुकाये,
रंगीन जिल्दों के भीतर की शायरी
बे
गाये
मौन मुख वाक़िये वफ़ा हो गये !
कारी कजरारी आंखों में आकंठ डूबे
देखे जो सपने
साकार
होने के पहले हवाओं सा बदले,
ऊंची ऊंची उड़ानों से लौटे नहीं
मिल गया होगा
बेहतर ठिकाना
तभी ले उड़े हैं अनुबंध सगले,
कसमें किये की दलीलें हैं
उनकी
अनुबंध
के हम कोरे सफा हो गये !
शिकवे शिकायत नहीं कोई उनसे
पछुआ में भीगें
या पुरवा नहायें
हममें ही कमियां रही होंगी कोई,
सामर्थ होते यदि फिर भी बैताली
प्रश्नों से कैसे बचाते
तन ओढ़ी
अपनी बेदाग इज्जत की रंगीन लोई,
वहम प्यार का पी बहके नहीं
बनते
बनते
रहवास उनके रफा हो गये !
भोलानाथ
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