भूल पाओगी न उम्र भर
उस अधूरी
मुलाकात की
आशिकी तुम प्रिये, !
बोले नहीं मुख से मुख
प्यार
जन्मों का
आंखों में जी भर जिये !
गुलदस्ते रिश्तों के मिलते रहे
राह भर
किन्तु पल भर को
कोई मिला न तुम्हारी तरह,
बे बरसे सावन बे महके फागुन
आते जाते रहे
तीज
फगुन सा गा के गुलाबी जिरह,
सुरसा सी अपनी ही
घट बढ़ती छाया
परीक्षक
रही छल का सागर पिये !
विचलित हुआ न व्याकुल हुआ मन
बिंबित
झरोखों के
घूंघट में उगते उस चांद को,,
फाग फगुआ के उत्सव से महसूसे
लम्हे जिया
सजते
नयनों के चर्चित संवाद को,
महकती रही सांस सरगम
टूटी
नहीं
लय राग सजती रही है हिये !
आंखों के आगे से गुजरे
यदि गीत तो
दहलीज पर
मेरे दिल के लिखा नाम पढ़ना,
वादे वफ़ा सब यादों के खोंखल में
छोड़ा
याद
आयेगा मिथ्या मिथकों का गढ़ना,
आहूत ख्वाबों के चौरे
बुझने को
हैं
अब उत्सव के जलते दिये !
भोलानाथ
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