Monday, 29 December 2025

पहरे में ठहरो पहर

पहरे में ठहरो पहर पांव पग रोको गुजरें न
लम्हे
ठाढ़ी रहने दो
बाहर द्वार के आज पूनम की इस रात को !

काली घटाओं की छाया में प्यासे पपीहे सा
लौटा है परदेशी
रिमझिम
झमाझम बरसने दो स्वाति बरसात को !

गोमट चुनरिया की आंचल बंधी है,विरही
तपन की काया जली
लेप मरहम चुपरते
बे बात बीते न मनसुख बहारों की सुर्खाब रैना,

ओरगाव की आग के उपले सा दिन रात सुलगे
जले हैं महमहाया है
तब यह सिंधौरा का
सेंधुर अंजे कोर काजल गुलाबी ये नैना,

सुधियों के जंगले झरोखों की चंचल हवा
झूला झुलनी झुला के
रह रह
रिझाये उकसाये भीतर दबे तात जजबात को !

द्वन्द गुंफित व्यंजना की कैसे कहूं,वक्ष की
प्यास करती रही मसखरी आंख से
जाया
होता रहा वक्त बढ़ता रहा ताप इंतजार का,

पर्ची परख पढ़ मेरे जिया की मुझ पर भी 
एक अहसान कर छोटी है ख्वाहिश,
हाँ तेरी बड़ी है
दे वक्त इतना पूरा हो कोरम श्रंगार का,

बेलिया द्वार तोरण की सांसों में महके
उम्र भर के लिये
नया रचने दे
इतिहास प्यासे दिलों की मुलाकात को !

मेरे चाहत की मंजिल चाहत से होकर शुरू
संझा बाती की
अंतिम लौ पर खत्म हो
कर पूरी मंशा देखा जो मैने जीते जी ख्वाब रे,

व्यापे बिरह न बढ़ें दूरियां गलबहियों रहें हम
सदा साथ
पानी पानी सा मिल के
एकांतिक पलों के सुख से भरे हों नयन बावरे,

सजती रहे रोज वैसी ही यादें जैसे छज्जे
अंटरियों में
चढ़ चढ़
की ताका झांकी द्वारे लगी उस बारात को !

भोलानाथ

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