खेल खिलाडी फुलवारी की
बोंडी बोंडी
खिलने दे कलियां
खेल न
असमत से माली !
राज महल की उठा धरी में
मत मसल लतायें
सींच प्यार से
मत दे
उपवन को गाली !
माना की इन उठते झंझावातों में
तू
कहीं नहीं था
बेमन गले लगाना भी
अपराध की श्रेणी में आता है,
सोये जहन बेहोश देह पर
बाहुबली के पीठों छापे
मुह मुह प्रचलित किस्से
शौर्य सरीखा
भय बस निर्बल गाता है,
छाती छुअन जांघ देख न
देख देह की
आग का जज्बा
पोत न
मुखड़ों कालिख काली !
आज जो बादल गरज रहे हैं
नभ में कल नहीं होंगे
जिनकी छाया बैठ ऐंठ के
लाज का
चीर हरण कर आँख तरेरे,
अंधी आँख सबै सब काला
चिल्लाचोंथी कान सुनै न
मन की बात सुना
मुह मिट्ठू
जनहित उठती ऐंठन पेट करेरे,
देह दाग सहयोग में दाग की
लीपा पोती
खिर खिर
हवा में
बिखरी दाग की लाली !
पकड़ न तितली उपवन उपवन
मींज मरोड़ तोड़ पंख न
उड़ने का संबल दे
हवस के चूल्हे
रांध न खिचड़ी सेंक न रोटी,
सात घरों को छुये न डाईन
भरे पेट की भूखी काया की
हलचल ने काटा है
विश्व पटल पर
घर मुर्गी की बोटी बोटी,
बेनथ नाकों रस्म निभी न
उँची नाक
सुकन्याओं की
नोच
नहीं कानों की बाली !
भोलानाथ
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