हवा भोग पर जीवन यापन
चूल्हे चढ़ी खीर सा
कान उबलती
सुबह शाम की झिड़की !
श्मशान परस्ती पांव पलंग पर
बेबस हांथ
खुले न खोले
आय की दूजी खिड़की !
भीख कटोरा बसर जिंदगी का
मीठा अहसास
फर्ज की रद्दी में
बेले पापड़ सा किरचा किरचा टूटा ,
भरी जवानी के उपक्रम का कोई
मोल नहीं अब
कोल्हू बैल सा
पकी पसुरियां तब सोता यह फूटा,
चुगे खेत बे चुग्गा क्यों कर नेह
निभाये
डोर नात की
तोड़ रही नकचढ़िया पिड़की !
उंगली गिने हैं कारक रक्तचाप के
फिर भी
ढोंग परस्ती आदत
प्रश्नों पर है उत्तर से अनजान,
अंध अबूझी गहिर कुआं सी
बंद पहेली बे संघर्ष न उगले
हलक में
अटके रोटी कपडा और मकान,
हवन हवाले समिधा छाल तिन्दुहरी
जैसे
जली आस्था
तिनगी तिनगी असमय तिड़की !
हाथों हाथ रहे न छूटे सब मझधार
तिनके जैसी
बहे जिंदगी
केवट का किरदार निभाये शहरी बाबू,
घाट बाट तट धुआं धुआं दिशा शूल सा
भ्रम गहराया
हक्का बक्का
बिचलित मन का संशय हुआ बेकाबू
निपट अकेले थे मेले में अब भी
रहे अकेले
थके न
हारे सुन सुन उनकी हिड़की !
भोलानाथ
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