Monday, 29 December 2025

गीत लिखा न गाया

गीत लिखा न गाया आसमान का सूरज
बहुत बिराया
भरी दोपहरी
जुगनू की लीलायें गा कर हरदम धन्य हुये !

बेतुकी कहन तशतरी में रख कर विज्ञापित
करने वाले
निज स्थापन की
युति में अंजुरी ओलिया भर भर पुन्य हुये !

प्रायोजित तिकड़म के सूत्रधार तुम मन से
मन तक स्वच्छ नहीं हो
मुंह भर बात
पेट भर आगी बे मतलब की फटे बांस सी राग,

नामी नाम हाशिये पर हैं चिल्हर के कनफोर का
कोई मोल नहीं
बिरहा गा कर
सावन का क्यों खेल रहा है फागुन वाली फाग,

पढ़े न पोथी फाड़े पन्ने  मंद बुद्धि की कुंद
सोच
सुकराती प्याली
भरा लबालब जहर पिलाया मुजरिम अन्य हुये !

चोटी चोटी पर्वत फतह जो कर सकते थे उनके
सम्मुख
गारा गिट्टी बजरी बालू
नन्ही मुरुम मिला कर सरग छुई दीवार चुना दी,

बंधे पटौती ग्रंथ न पलटे व्यास पीठ पर मुहर
लगाते नाम की अपने
गोकुल गोविन्द
कहते कहते लाल किले की कथा सुना दी,

बड़े विसर्जन की तैयारी में पुरे फूल मकरंद
महक के झरे
परागी
भ्रूण हवा में सभी निषेचन जन्य हुये !

सड़ी धरोहर असह गंध मत बेच इतर के मोल
भरी नाक गुण धर्म न समझे
झूठ मूठ

अब और नहीं ब्याध व्यथा सब सच्ची सच्ची पढ़,

धूमिल धूमिल वर्तनी पुस्त पुराना आँखों का
अभ्यास,चेत अभी भी वक्त है
नई
शिला के वक्ष में भाव भंगिमा वर्तमान गढ़,

ताड़ चढ़े हिम्मत के तोते किस अभियान में
उड़ते
सावन का उपवास
न टूटा जल भरे बिलों के दान अनन्य हुये !

भोलानाथ 

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...