Monday, 29 December 2025

गुरु पद वंदन परम्परा की

गुरु पद वंदन परम्परा की
कंधे कांवड़ बोझ उठाये
लसक
नाचता आंखों का उल्लास !

दीन हीन दुख दैन्यता बुद्धिमता के
द्वार पर
पन्नी
पुट्ठे बीन के तोड़ रही उपवास !

अक्षर से अनजान गुरू पढ़ रहे
लिलार लकीरों का अनुवाद
हिचक बिन
लंगड़े तारक मंदबुद्धि गुण हीन,

रामायण में अनुभव अपना लिख गये
तुलसी
दंडवती मुद्रा में
पलेंगे पिछड़े हो के ज्ञान प्रवीण,

भक्ति भाव की उत्तम ताड़ी पी पी
जी गये पुरखे
हस्तांत्रित
कर गये रिवाजों का इतिहास !

पाखंडों के शिलालेख की बे समझी जो
थिरक रही है
उतरी नहीं
जहन से और बढ़ी दिन दून खुमारी,

हंक रहे प्रपंची बाड़ों में गाडर के
अनुरूप
दिखा न तोरण
मोक्ष द्वार का बुझी मशालें सारी !

दिया दिखाते पदचिन्हों का वाजिब
अर्चन किया नहीं
बस
सहा सियारी हुआ हुआ संत्रास !

रोजी से नित रोजा हैं बे रोजी पट बंद
गुरुमुख
भरी पान की पीक
चेलाने गाभिन गाय सा खांसें,

भूत भविष्य के वक्ता वर्तमान की
ताल तलैया
उड़ती धूर की
मरी मछलियां मुख जालों में फांसे,

झांसों के सावन में झूल न झूले
काढ़
सके तो
काढ़ वक्ष में धंसी युगों की फांस !

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