लाचार बचपन द्वार द्वंदों के बीता
दीवार फांदी
न सेंध
सुंदर भवन के पिछवाड़े गुपचुप खुना !
पिघलता रहा लौह सा भट्ठियों में
ढल ढल के
बेढंग
नातों के सांचों में सूखे चनों सा भुना !
फूट पकते फफोलों ने अवसर
दिये ही नहीं
और आवारा भौरों ने उड़ उड़
खिलाया कली उंगली हम पर उठी,
उलझे उलझे सिरे छोर करघे के भीतर
देखा नहीं ताना बाना कभी
फिर भी
गाते कबीरी फिरे पीठ पीछे हठी,
उमड़ते रहे खूब संशय के बादल
बरसे न आंगन
पिछवाड़े सावन झड़ी सा
अफवाह उड़ती उनने बुना !
बे आग उठते धुओं की कालिख को
क्या देते शंख सी सफाई
तोड़ आये समय से
भरे मन जाजम के रंगीन धागे,
कबंधी रवायत का वह खाली खाली
सघन वन पूरा का पूरा
खाली हुआ
और भरते कुलाचें हिरण सबले भागे,
रामनामी के भीतर चील्हर सा चिपका
स्वारथ समझ बूझ
जलते दिये की
पेंदी को मन से किया अनसुना !
आगे नहीं कोई पीछे पड़ी लठमारी की
लठिया,भागे धुरी से
परिधियों के
बाहर,बचाये हया हम ठाढ़े अकेले,
पर्वों के उत्सव झमाझम सावन की
लय लोरी कजरी
शिवालय के अर्चन
फीके लगे हाट बाजार भीड़ों के मेले,
स्नेह वत्सल के दुलराये अंखुओं की
आंखों में बिंबित है
अब भी
अश्लीलता ने तन मन रुई सा धुना !
भोलानाथ
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