फूल रोपते उम्र बढ़ानी महमह महके
महल अटारी
लाचारी के
हिस्से आई बेर मोकईयों वाली बाड़ !
नीम बकायन का गठबंधन खोज रहा है
चंदन वन में
विषधर चेहरे
गा कर भव मंथन की नई नवेली आड़ !
सुलगी कहां परोली आग उठी चिंगारी
भभक कहां विकराल हुई
तेज लपट में
जले पड़ोसी खाक हुये आंखों के ख्वाब,
घरफोड़ू सब चोर उचक्के भोंक रहे
आकाश देख कर
गिले गिनाते टूट गिरे
ध्रुव तारा सायद बदलें लोक धर्म वर्ताव,
ताजोतख्त विरोधी गतिविधियों से आगे
देश विरोध में
दुश्मन देश की
ड्योढ़ी पर है वफा का चोला फाड़ !
दगा सगा न हुआ किसी का भांप इरादे
विषम स्वरों के
स्वच्छ हृदय के बोल नहीं ये
हिंदी हिन्द जलाते छद्म का हिस्सा है,
पटकथा पुरानी पढ़ने वाले पढ़े लिखे सब
लोग नये हैं
कहा सुनी विस्तार प्रपंची
उगले जुमले मनभेदों का किस्सा है,
परकटी चील की चीख हवा में सपन
उड़ानें
नब्ज टटोली
यात्राओं की पीर समानी पकी देंह की हाड़ !65
सीमाओं के अवरोध फांद पद पूजक हृदय के
मन्त्र निराले
बलशाली हैं
राष्ट्र विरोधी पलक पालकी ढोने वाले कंधे,
मीम भीम गठजोड़ नहीं बीमारी है घर घर
अलगाववाद की
वोट बटोरी
भंगचढ़ियों के गिरोह गिरह हैं अकल के अंधे,
व्यामोहों में भोंक रहे जो अवसरवादी
कुनवे
कपट कपाली
पाली फितरत उगले जहर न औटे खांड !
भोलानाथ
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
-
नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
-
जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं उस दूर दराजी प्रीतम को यह संदेशों की पाती ! हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित तू ही बनजा दूत रे बदर...
-
जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...
No comments:
Post a Comment