Monday, 26 August 2024
आंख है बावरी
Sunday, 11 August 2024
धानी धानी पोशाकें पहिन आया सावन
आया
सावन
बाँहों में भर भर बदरिया !
बेदर्दी बालम न आये !
मौके मिलन के निकले हैं कितने
कह कह जिगर
जिया
आये न मिलने संवरिया !
सावन की रिमझिम रुलाये !
नीड़ नयन फगुआ की सोई चिरैया
रिमझिम
फुहारों की भीगी
जाग गई आज आधी रात को,
भीगा बदन आग अंतर की रह रह
देहियां जलाये
रूठा
रिसाया जिया है पिया मुलाकात को,
सुधियों की जी भर ठिठोली के
रंग में
रंगी है
ओढ़ी ओढ़ाई चुनरिया !
पथ लखती घूंघट उठाये !
अकारथ सी लगती मोबाईल की मूवी
सखियों की
चुलबुल चुहल
धंसती कटारी सी बिरही जिया,
झरे फूल चर्चा के मकरंदी अमृत
रिसरिस के
बहता जहन में
जैसे अभी ताजा ताजा पिया,
छुअन ओंठ बिसरी नहीं
मिश्री
मावा सा वादा
काजल सी आंजी सुरतिया !
बिछी द्वार दिल को बिछाये !
चिट्ठी नहीं खबर मैसेज़ में आई
अवकाश
मिलता नहीं
पिछले वादे वही दुहराये फिर से,
पढ़ पढ़ संदेसा बिचलित हुआ मन
सम्हाले न सम्हले
थर्राया
जैसे निकल गई घिघोरी सिर से,
बिरह बेल किसी तरह सूखे
फिर भेजूं
परदेश पाती
लिख लिख दिल की खबरिया
समझें न जिया की बताये !
भोलानाथ
Saturday, 10 August 2024
इस उस पार की आवाजाही
Sunday, 28 July 2024
पगड़ी पाग मुंडौसे धर धर
पगड़ी पाग मुंडौसे धर धर आंख लगे न
कलथी करवट
टोरे खटिया
चुटकी ऐंठ चढ़ाते टूटें पकी मूंछ के बाल !
सावन की बरसात अँधेरी रात न सूझे
चिंताओं की चिनगी
रहे फंसाते
भावावेग नदी के गहिरे डारे जाल !
घाट घाट सब भरी पाट के कगरे डूबे
नाक के ऊपर चढ़ता पानी
देख मछलियां भाव बहर से
कूद कूद के चढ़ गईं उलटी धार,
छप्पर टूटा चूल्हा फूटा धार धार
बह रही गिरस्ती हीची हिम्मत
हारी हारी हाट खड़ी है
बोली में है पानी का व्यापार ,
रिमझिम रिमझिम रुके न बरखा
पानी से मिल पानी बहे चौगिर्दा
बेपरवाह
पहाव पिठाहीं जैसे लदा हुआ बैताल !
बाढ़ भयावह लख लख सांस सवाई
नाव बहे बेरास थमे न
बुद्धि बिसाहे तेल में रपटी
रटा पहाड़ा विस्मृत भागे भूत जहन के,
बजरंगबाण का पाठ मन्त्र ओठों का झरना
सांस सांस संदर्भ सुरक्षित
बिम्बायित हैं
आंखी अक्स पुतरियों लंका आग दहन के,
पुरवाई ले उडी वक्ष की शांति ,सुकूनों का
सुर्खाब समय
रह गये चकत्ते चित के सुध बुध
भूल भरोसा भटके मन का ख्याल !
भग्नाशेष किलों के शिलालेख मिट गये
रही न शाहंशाही शेष
परन्तु पन पंथों की बग्घी का
रंग उड़ा न थमे लीक के चलते पहिये,
ऋतुयें बदलीं बदले मौसम समय की
पहुँच के बाहर
रहीं रूढ़ियां पानी पोखर भैंस मर्म
किस औघड़ से अंसुआ ढार के कहिये,
तांडव नर्तन एक सा सबका कंठ हलाहल
हंस हंस उगलें
शीश जटाओं के
क्षत्रप की छाया फन काढ़े हैं व्याल !
भोलानाथ
Sunday, 21 July 2024
हलाकान परेशान थे पर भूखे न थे
हलाकान परेशान थे पर भूखे न थे
तब पी पी घ्यांघ मठा महुओं के
गुजारे दिन
अब दिवस सांझ दो जून के भूखे हैं !
अभी सिथिल सौगात देह के हिलते
पुर्जे पुर्जे
आमद की परवाह में पचके गाल
अमाशय आंत ओंठ रस सब सूखे हैं !
आमद शून्य शिखर महगाई,लटपट
जिभ्या ओंठ चांटते पेट भरे न
रोटी नून की भीख सी
चाहत अलखाते दिन पर दिन निकरे,
ढलते दिन की बाढ़ी छाया हाल न पूंछे
सबोधन के प्रतिउत्तर में
झुंझलाते
संवाद समापन बिपत में छोड़ के संकरे,
आफत के अम्बार का दुःख क्या कम था
अनचीन्हें मेहमान सरीखा
नया नया दुःख पा के
बोल कंठ के कुछ कडुवे कुछ रूखे हैं!
डगमग चाल बहकते पांव लीक पर
बिगड़ रहा संतुलन सम्हारे कैसे
बांह बिराती
भीतर पाली इच्छाओं की उडी चिरैयां,
क्या कुछ शेष रहा अधमरी देह में
हांके हाथ न नाक की माछी
जगह जगह से
बारी बारी खखलें छत्तेदार बर्रैयां,
बुझती आग अंगीठी धुआं उठे न धधके
आगी
बर्राते मुख गुर्राते चेहरे
दबी आग सी हाथ लकुटियों के खूंखे हैं !
गंम्भीर नहीं है आंख का तारा न ही
वक्ष की उजर तरैयां
तारा मंडल बंध भूली हैं
गोद पिता की महतारी का प्यार,
उनके अपने अपने खुली आंख के
सपने अलग अलग हैं
बूढ़ विचार सुनें न माने
कौड़ी लेखे घर आंगन खेला कूदा द्वार,
टूटे पेट बंधी उम्मीदें ख़ाली ख़ाली तबा तबेला ख़ाली भात भगौने
भीतर
भरी आंख धर मुख गमछों के मूखे हैं !
Friday, 19 July 2024
थूक दिया रे थूक दिया भरी मुख पान पीक
थूक दिया रे थूक दिया भरी मुख
पान पीक
हक मालिकाना समझ के
जटा जूट थूथुन से पांव भर
थूक दिया रे !
उपर दोमंजिला खिड़की के
पर्दे हटा के
नीचे न देखे निहारे क्षितिज
खोंपा मोगरी का जैसे
उलूक जिया रे !
आंगन खड़े हो हकलाते हलक बोल
कांपते जिगर हंफहंफाती भरी दम
किस मुंह से कहते
जाहिल जमाती बिगड़ैल को,
अंधेर नगरी के द्वन्द में कौन चाहेगा
देखना सावन के अंधों के
वक्ष पले
भीतरी कबंध की ओंठ रची मैल को,
अकथ कत्थ्य तथ्य के विरोध का
आत्मघाती कहर
स्वाति
बरखा के जैसे जहर रोज बूँद बूँद
मूक पिया रे !
बीछी बर्रइयों का मन्त्र नहीं सीखा
सहज भोर
बांमी में हाथ कैसे डालूं
मालुम है संवेदन फन काढ़े सांप का,
लाठियों का खेल खले ओझल है
आंख से संपेरा
बेदखली आलम के बगलगीर
गूंगों को भान नहीं मेरी अलाप का,
ताड़ चढ़े अभय भाव पढ़ पढ़ के
करुण हृदय अश्रु ढार
पूंछ रहीं
सजल आंख किस गुरूर के लिये
यह सुलूक किया रे !
शाहंशाही का शाह नहीं तू भी
पहरेदारी का
कुछ मान रख
रोज लबरी लपेटों के
माया जाल का अंजाना भय न दिखा,
दरबारी बैठका की धूर धौंस झार वहीं
ओजस्वी हरु गरू गोड़ गैल रहने दे
चलने दे
पांव पांव खेलना और न सिखा,
आंजी आंख खोज लेंगी सूजियां
भूसे के
ढेर से
ढलने दे पहर पहर बरसाती रात
मत फूंक दिया रे !
भोलानाथ
Wednesday, 3 July 2024
गंध गई न मन की
गंध गई न मन की इसको धमकी
उसको गाली
पन्ने फाड़
ग्रन्थ के रहे कोसते पी पी पानी !
आंख खुली तो अस्त व्यस्त देखा
चौहद्दी
बे पानी
मर गई चिरैया पिंजरा छोड़ निसानी !
वेद का भेद लबेद न जाने रहल लपेटी
धरी पटौती अपढ़ ऋचाएं
पकड़ा नहीं
रश्मि का ज्योतिर्मया पुंज सी पूंछ,
बैतरणी के घाट घाट की गहरी गाढ़ी
धुंध के भीतर
धार न झलके
अंदाजों की कसी मुट्ठियां टेढ़ी मेढ़ी मूंछ,
कनपट कान छुआ न दौड़ चला
कौओं के पीछे
घुटनों बुद्धि
रुके न थके थके हांफे मनमानी !
बढे मूंड ख़ाली हाथों का बंदोबस्त
बस्ते में बंधक
जाहिल जहन के घूरे
हवा झले न सुलगे दगे न भीतर आग,
पुरखों के पद चिन्ह पढ़े न समझे
बाबा भीम की
ओंठों थूंकी पींक अंजुरियों
भर भर रागी जी भर खेलें फ़ाग,
टुकड़े टुकड़े तोरण टूटे आंगन
रार देहरियों की
तकरार
न जाने घर खोंपा की हानी !
बक्री शनि की छाया सिर का साथ न छोड़े
सह सह समय थपेड़े थाप
न बदली चाल
चट्टानों तरुआ तन गिट्टी सा फोड़े,
राहु केतु की दशा निराली बिचलित मन की
गड़बड़ झाला
पोर पचासी गिन गिन
पंहुंचा पकड़ पांत में पांच को जोड़े,
कुछ कुनबों की भीड़ बटोरी
गरजे बहुत न बरसे
सावन की
पलटी पछुआ में जल रही जवानी !
भोलानाथ
Tuesday, 18 June 2024
प्यार मिला न गीत मौज का
प्यार मिला न गीत मौज का
न मुख कोरस
गाया
बस छूटी हुई कहानी है !
कुछ तो था उन नम आंखों में
आकंठ
अभी तक
डूबी वहीं जवानी है !
खोया ही खोया है
मन मिला नहीं
कुछ
चित्र को मित्र बनाया है,
आंख से आंख का
देखा
सपना
अब तक आंख समाया है,
पल दो पल के उसी मिलन का
झर झर के
अरझा
आंख बिरौनी का पानी है !
उस पार है तू इस पार
हूँ मैं
कैसे देता तुझे सहारा,
गहरी धार की कस्ती
उथले में
डूबी
छू छू सतह किनारा,
घनघोर घुपे बिखरे न बरसे
बिरह पीर की
कायल
काया कसक पुरानी है !
तू नदिया न मैं जल हूँ
दोनों
दूर के
अलग किनारे हैं ,
भरी नदी की बहती
बहर
बिराये
कानो लहरी गुंतारे हैं,
गाने को कुछ शेष कहां है
सूली चढ़ी
मौज की
मुखरित चतुर बयानी है !
भोलानाथ
Monday, 17 June 2024
गाया गुना न सुनी गाथा उनकी
गाया गुना न सुनी गाथा उनकी
श्रीमुख के मेले ओठों के झूले
मनचाहा झूले अकेले
ख्याति की खुशबू झरोखों से आई !
मन ऊबा ऊबा उथले में डूबा
वेदांति कुनबों के ठूंठे
खन खन चंदन वनों को
कनफुहियाँ महकी जबरन सुंघाई !
भगे भूत लातों के छिनरी जमातों के
चर्चा के नायक ओढ़े आडम्बर
तुलसी के चौरे
कबीरा की लय में शैतानी गाने लगे हैं,
भाव भजनों की घूंटी पिये मन की गंगाजली
बाबागीरी न जाने
शातीर मुखौटों के गिरगिट
गुरमेटी टेंटे टका के केवल सगे हैं ,
फगुआ के रंग में रंगी व्यास गादी के
आगे थिरकते
ढांचों के
बांकापन में पूरी की पूरी रासलीला समाई !
फुरकी में नदियां चुरूओं में सागर
कखरी सरग सुख
वैतरणी तारण अवतारी बाबा
पूंछ बछिया की लहरों में डारे खड़े हैं,
गील गोबर की गौरी चंदन का लीपा
शिवालय के बाहर
रगी की ठगी के संकल्प साधे
छीनी छुड़ाई उपाधियों की जिद में अड़े हैं ,
गोंईडे की गौंखर की हरियर चरौंखर
चरी गाय की देखा देखी
खूंटे की बछिया
चौकड़ियां भरने को भीतर रम्हाई !
कथनी कथाओं के नवसिखिये वाचक के
कच्चे जहन की
कचनारी लपेटों लपट की परख नहीं
नाहक ही घूर सा सुलग रहा गीला गीला ,
पानी पवन की पगड़ियां उछाले
न समझे मर्म गीत का
बड़बोली कुबोली का ठिकरा
मूड़े मूड़े में फोड़े ख़ाली घड़े सा बाबा हठीला,
लड़ती हवाओं से जलती दिये की पेंदी में
पनपी
सूर्य रथ लगाम थांम साजिस
उबलती रही खीर सी ठंडी ठंडी कढ़ाई !
भोलानाथ
Sunday, 9 June 2024
कुछ मत कह कुहनी कखरी की
कुछ मत कह कुहनी कखरी की
चटकी हडियों
अधपक खिचड़ी
निथर निथर बे बाट पड़ी है !
चेत,चबुतरे गाड़ न चिमटा
धूनी धुंध
धुआं के
सम्मोहन से रैयत बहुत बड़ी है !
दूध भात की दिया दिखाते
दौड़ न पीछे
उड़ जाने दे
ले के पिंजरा तेरा नहीं सुआ,
मान ले कहना कोस न आंसू ढार
धीर धर
बिछ स्वागत में
लौटी नैहर छोटी बड़ी बुआ,
टूटे मन की कान में मिश्री
धीरे धीरे
घोल
चुनौती चकरफंद चौगान खड़ी है !
रामद्वार दरबार की पहरेदारी का जिम्मा
मुंह
औंधे गिरा
मलिन मुख किया धरा सब फेल,
राम की नगरी रमे राम की आरत कीरत
ध्यान
दसौना
रामसिया मय जहन जिया न जाने खेल,
विचलित तन मन का भ्रम सधे न साधे
छलकी
आंख
हिदायत वक्ष धूप सी बहुत कड़ी है !
शपथ सिरोही पांव कटें या देह फटे
दोफाड़
जिया
दुशवार समय में दीपक सा जलना है,
विघ्न विनायक किरदार के जैसा
भौदा
भरी लीक में
सधे बैल सा बे पानी पग पग चलना है,
भिन्न भिन्न मत पंथ पीर में
उहापोह की
जीवन
शैली ,नागमणी सी मुकुट जड़ी है !
भोलानाथ
Friday, 31 May 2024
क्षुद्र क्षीण बेमन सी मिलती
क्षुद्र क्षीण बेमन सी मिलती धाराओं के
संगम संगममेंढकमुखी
सबब के सुने गूंजते चौमासी गुंतारे !
ऊंची उठती लहर डुबोये ताल तलैयों
सागर सागर
पुलियों की क्या अवकात
हिमालय खड़ा अगाडी मुकुट उतारे !
खन खन खोद खेत के ठूंठी ठूंठे बोये बीज
कसौटी कस कस
सच की सपथ गवाह में
रैयत भर भर बोरे गाह रही अफवाह,
दलगत गति की उबी ढुलमुली भरम को
पवन पल्टियों के ढब से अब
फुरसत कहां
सुने जो जन की शाहंशाही की केवल परवाह,
झूठ गवाही लंबित प्रकरण के अनुमानित
गुण दोष दलीलों के
घूरे घुस
सच्चाई का सिरा खोज कर कौन निकारे !
राजा सनकी प्रजा पतोहू परचित पुतलों का
जगजाना दरबार
पिये पूरा मदिरालय
जहन खुमारी ओंठ डकार न आने दे,
चिखना चीखन मुख का घूंट घूंट हिलगंट
गले की
बुद्धि के बूते बेल पचाने के
उपक्रम का कोढ़ी कोढ़ न बाहर आने दे,
जिल्लत जिये सीखचों का विस्मय
अनुदान के जैसे
मिली रिहाई
सांठ गांठ की गांठी गांठी गांठ सम्हारे !
नाक कटे की जिल्ल्त कैसी ढीठ टपोरी
अंतरा क्वातरा
खोरी खोरी कटी कलम
उल्हन सी कट कट बढ़ती ढाई बीता रोज,
अचरज आंख जहन भौचक्का
मंत्री मंत्री चोर
न टूटी ओंठ ओंठ की चुप्पी
डाकू सूबेदार बताती रही पुलसिया खोज,
ठहरे रह कर अपनी सीमाओं में
सगले
बख्तरबंद सिपाही
व्यापारी व्यौहार में आंख का सपना हारे !
भोलानाथ
Wednesday, 22 May 2024
मुँह गुरतुर दिल जहर हितैषी
मुँह गुरतुर दिल जहर हितैषी
अखरे जैसे
अंगुरी अंगुरी नख के नीचे
रह रह चुभती फांस !
उलहन उलहन आँख आँसती
धुंआ रसोई भात भगौना
भांप
सांप सी छाती लोटे सांस !
जरन बरन की लपट हवा मिल
सेंक सेंक कर
कान के परदे
जहन में आग लगाये,
हाथ सेंकती भीड़
भितरिया जतन जायका
भेद अलहदा
मुहदेखी की मुँह बतियाये,
खाली पेट बेदाँत मोलाते
भेड बकरियों जैसे
कूते कुटिल कसाई
जीवित देह का मांस !
चर्चाओं के रंगे बताशे
कान
राग बगदरी
ओंठ के मंजे मंदारी हैं,
सरस्वती पुत्र गणपति के
साधक
गरु गुरु जी हरु बोल
आवर्ती गायन दोधारी हैं,
मौनमुखी सुन देख समझ
खरभरी मचा न
पुआल के भीतर
अकबकी के आलम धीरे धीरे खांस !
इस उस डार कूद न
भर किचकार दांत की
बंदर जैसे
दूर रहें नटखट उत्पाती,
सत्यम शिवम सुंदरम
अलख जगायें
जियें जिलायें छोड़ ठगी
अलखायें न ठकुर सुहाती,
महमह महक उठे पुरवाई
शरद सूचना देत
थकें न हारें
रन बन फूलें धानी धरती कांस !
भोलानाथ
मधुमासी देह के
मधुमासी देह के
मचले मन केभाव ओंठ में
धर अपने तुम
मन के भेद न खोलो !
पढ़ लेता हूँ
जिगर तुम्हारा
सुन लेता हूँ
आंखों की
केवल आंख से बोलो !
छत की छांव
सहोदर
कानों सुनी दिवारों की
आंत पचे न पानी पाथर
पनघट आग लगाये,
अक्स आंख में अभी अधूरा
पनपे पूरा
कमल सा खिलके
भीतर भीतर
भौंरा मन की गाये,
बनते और बिगड़ते
मौसम का
रुख भांप हवा की
पुरबा पछुआ
चलती नब्ज टटोलो !
कच्चे अनुभव का पक्का
कौतूहल
साझा करते
अपनों के आगे
सांस थमे न स्वर हकलाये,
कर सको जो साबित
कितनी कितनी
आग की नदियों
जल भुन जिये मरे तब
तेरह तीन से बाहर आये,
लैला की
किरदार नहीं तुम
राधारानी का रंग
धीरे धीरे
हृदय में घोलो !
अनुरागी मन के अनुराग का
सहज समर्पण
मान मिले तो
मिल जाने दो
जैसे दूध में पानी,
विज्ञापन सा
लिख देना
उन बंद किताबों की
फटी पुरानी जिल्दों ऊपर
अपनी प्रेम कहानी,
चलन के बाहर
गाल बजाती
फुटकर की जिद
बाहर बजने दो
खींसा नहीं थथोलो !
भोलानाथ
व्यूह परिधि के हाहाकारी
व्यूह परिधि के हाहाकारी
साक्ष्य के अक्सआँख किस आँख को दे दे |
जुमलेबाज शिविर का
है क्या कोई धनुर्धर
चील चीख सुन लक्ष्य जो भेदे |
किरदार द्रोण के बने रहे वे
थके न हारे
पिछलग्गू जन
झुक झुक शीश नवाते ,
कुओं के बाहर क्षितिज देख
ऊँचे
सिर वाले
ऊँचे रहे सदा टखने मिजवाते,
भेंट मिली दुदकार फतोहीं
देह ढके या
ऊब उबासी कन्धों रे दे |
उखड़ी नाभि की करकस पीड़ा
नस नस चिलके
ऐंठे पेट
न छूटे हाथ का लोटा,
मींज मसल पिड़री की मालिश
वैद्य हकीमी
विफल
बिराये खूंटी टंगा लंगोटा,
गोबर गुदड़ी
पुआल पला सच
बिलों में पलते चूहे सांप रगेदे |
पग पग पर्वत जैसे
अवरोध हटाते
झरा पसीना
समय सार जीवन का बीता,
भूले बिसरे शिलान्यास पढ़
चरणबद्ध पग
काट रहा है
लोकार्पण का फीता,
सूरजमुखी बिहान चांदनी
रात तरैयां
जुगनू जैसे क्षितिज के गेदे |
भोलानाथ
सिकुड़ी देह दांत बिन
गुंजन गीत परागी नद में
बूड़ बसंत सिराने करने लगे फसाद !बूढी काया हाड पासुरियाँ
भर सकोगे क्या फिर यौवन का उन्माद !
सिकुड़ी देह दांत बिन
स्वाद चटोरी जीभ बिसर
पकवान देख
मुँह मुस्का खींच चढ़ाये ,
पुष्प धनुष सर सधे न साधे
लक्ष्य रूप आकार
विविधि सन्दर्भ सार के
रोचक पाठ पढ़ाये ,
बीते जीवन की सडी गठरिया
बड़ बोझ बुद्धि के प्रस्तावित संवाद !
कामकंदला के पग घुंघरू
लय की थिरकन लहर सांस की
साध सके तो साध
माधवानल जैसा संगीत ,
ठूंठ हुए बरगद का पता
पूंछ न मिटें महल
महके पुरवाई धुले कोर न काजल जैसे
अमर आँख की प्रीत,
जाया समय फिरे न लौटे
रिसरिस चुये छपरिया जैसे छाती का अवसाद !
भोलानाथ
चौकीदारी कर या पहरेदारी में
चौकीदारी कर या पहरेदारी में
विश्वास खपा देजाहिल जहन तरन्नुम वाले
स्वर्णिम सीढ़ी रूम रपक कर तोड़ेंगे !
बेअदब की धारा बहे पहाव सा
बहते बहते
हूर बहत्तर के ख्यालों में
बम बारूद देह भर चौखट चौखट फोड़ेंगे !
दूर देश की रणभेरी सुन गांव मोहल्लों
गोल बना के पल्लम पल्लों
पांवों की रफ्तार बदल
अरदली अवाजें भांज रहीं तलबार,
मत कर जाया समय घिनौनी चाल
चरित बुनियाद बनें फांसी का फंदा
चेत चौंतरे काट तिलिस्मी
तारों वाले झिलमिल जालों का अम्बार ,
चौराहों की जिन्नाती तकरार के अगुआ
जुम्मे की बारात के
बड़बोले मुख
घोड़ बछेड़ा छोड़ गधी के कान मरोड़ेंगे !
विश्वासी सदगति सबकी सहयोग सहोदर
मंत्रोत्चारी गीता ग्राहय नहीं जिनको
वे जहन जिहादी
न तब थे न अब हैं वतन विकास के राही,
ब्याध न जाने पीर तीर की कनपट खींच
कमान प्रत्यंचा
बेंधे बिहंग उड़ान उंच न उड़ने दे
कठघरे खड़ा इतिहास जिरह की झूठ गबाही,
निर्वसन प्रपंची पांव ठठा ठोंकी ठुठियों सी
ठगे गांव के गांव
सिकहरे
धरी दुहनियां निमुआं दूध निचोड़ेंगे !
दउसाख मुख त्याग तबाही तमस पाल न
उजड़ी शाहंशाही की बतकही
समय के साथ नहीं
जिद जंजालों की सुर्योदय तक और भटकने दे,
सत्य सनातन शंख सीप के कुछ छिटके छूटे
बिखरे मोती गहराई के
चुन चुन लड़ियों हार हृदय
संसार की दौलत गिद्ध की आंख खटकने दे,
दिशाहीन बिदके बहकाये अश्वरथी थक हार
अलीक होड़ की
खींच लगामें
टूटे टेक धुड़ों के फटेहाल रथ मोड़ेंगे !
भोला
धुआं धुआं बिगड़े
धुआं धुआं बिगड़े हालातों के बादल
हटें तोदेखें
घटे कद सूरज क्षितिज के
धर धर के आंखों में आवर्धी शीशा !
ओठों की फुरकी हवाओं में उड़ती
चोरी की दौलत
छुपाई कहां है
फतोहीं के
बाहर या भीतर पखौरों के खींसा !
आवामी ओटों की पोती सफेदी
चेहरे की खातिर
खुलते खुलासों के
आवर्ती झांसों के
कनफोरू जुमलों के झूठे झमेले,
स्वांगी बयानों की युग्मी हवायें रह रह
दिखायें
आदमकद आईने की
छपकी गौरैया
बिम्बित प्रतिबिम्ब खुद का चोंच से उकेले,
रोजगार रोटी का हल्ला अनुदानी गल्ला
पेट में पचा के
आग प्रजनन की
उन्नति
उराव सबला अदहन के अदरक सा कीसा !
सरोकार साधन व्यवहार हीन शिक्षा
देशाटन की भिक्षा सी
राजा रंक दाता
विधाता न माने
पहचाने केवल कन्धों की रेई अधारी,
धरा धनु बरगद की खोखल लक्ष्य भेद
भूल धनुषधारी
तालियों की ताल में
नपुंषक सा थिरके
पांव बंधी पायल सी बजती लाचारी,
भीतरी भड़ास की अड़बड़ अड़ास की
समझाईस उलटी पड़ी
कान में अंगुरी डारे
शरणागती
सब गाते रहे मिलजुल के चलीसा !
ऊंचे पहाड़ की प्रदक्षिणा में पांव पांव
फिरते ऊंट की
चुनौतियों का असर बसर
दिखता नहीं
लौट आता है रोज रोज हारा थका छांव में,
तथ्य तकरार के निष्पादन का साक्ष्य नहीं
फिर भी
होड़ में है होड़ के लिये
नफरत के बाजार में
मिली न दुकानें मुहब्बत की, गांव में,
कंगीखानों का लाभार्थी लामबंद
कागजों की कोंख में
हष्ट पुष्ट
पल रहा है
चौरों चढ़ा के रोटियों का हींसा !
भोलानाथ
जले भुने मोहरे
जले भुने मोहरे मुखौटों का
मोहक मुखारविंदअफवाही
मजमों की मनचाही ओंठ में टिका !
सुनता हूँ जगह जगह मन आई
मन की
भांखते मसौदों में
देश पूरा परचुनियाँ नून सा बिका !
क्रेता की खबर नहीं उड़ती हवाओं में
अख़बार सी
छपती हैं
रोज नई चटकीली सुर्खियां,
लैया लाटा चना सा भुना सांच
आंच की गवाही में
आजादी
खादी की लील रही कुर्सियां,
मंदबुद्धि बौनों की भीड़ लिख रही है
वक्ष पर
बेकाबू
भालों के आचरण की रफ्तारी भूमिका !
दरम्यानी दरारें दिखें न दिखें
पैबंदी थकती नहीं
हाट
बाजार बेचेगी गुल प्यार के,
मति मारी रियाया बेसाहेगी श्वांगमुखी
सपने
मधुमासी अमराई
फुलबगिया घर की उजार के,
घिसा चंदन पथरियों का लीपा
लिलारे
चर्चित हवाओं की चर्चा में
चर्चित है खबर सी अनामिका !
तुलसी तासीर के अनुभवियों ने
दिया बार मबरी के नीचे
विनय
स्तुतियां तुलसी की गाने लगे,
गौ सेवा के बहाने मुर्गी पालक सभी
हींग की
गोली गाड़र को
गुड़ में मिला के खिलाने लगे,
नद नदियां रहें न रहें प्यास
उनकी बुझे
चाहे सूखे जले
महमहाती हमारे हृदय की वाटिका !
भोलानाथ
सुनता हूँ जगह जग
जले भुने मोहरे मुखौटों का
मोहक मुखारविंदअफवाही
मजमों की मनचाही ओंठ में टिका !
सुनता हूँ जगह जगह मन आई
मन की
भांखते मसौदों में
देश पूरा परचुनियाँ नून सा बिका !
क्रेता की खबर नहीं उड़ती हवाओं में
अख़बार सी
छपती हैं
रोज नई चटकीली सुर्खियां,
लैया लाटा चना सा भुना सांच
आंच की गवाही में
आजादी
खादी की लील रही कुर्सियां,
मंदबुद्धि बौनों की भीड़ लिख रही है
वक्ष पर
बेकाबू
भालों के आचरण की रफ्तारी भूमिका !
दरम्यानी दरारें दिखें न दिखें
पैबंदी थकती नहीं
हाट
बाजार बेचेगी गुल प्यार के,
मति मारी रियाया बेसाहेगी श्वांगमुखी
सपने
मधुमासी अमराई
फुलबगिया घर की उजार के,
घिसा चंदन पथरियों का लीपा
लिलारे
चर्चित हवाओं की चर्चा में
चर्चित है खबर सी अनामिका !
तुलसी तासीर के अनुभवियों ने
दिया बार मबरी के नीचे
विनय
स्तुतियां तुलसी की गाने लगे,
गौ सेवा के बहाने मुर्गी पालक सभी
हींग की
गोली गाड़र को
गुड़ में मिला के खिलाने लगे,
नद नदियां रहें न रहें प्यास
उनकी बुझे
चाहे सूखे जले
महमहाती हमारे हृदय की वाटिका !
भोलानाथ
आवर्तित आरोप अधूरे
आवर्तित आरोप अधूरे अरझी आधी सांस
उधार अधारीपीड़ित कंधों
कांख बंटी न रहे बदलते बारी बारी !71
ओंठ अलख अलखा के बेअदब अर्थ की
नासमझी खैराती बक्कुर का
प्रण सुन सुन
हने हुमक के हाथों पांव कुल्हारी !71
बेसुरे बिगुल के लय साधक साध रहे
टेढ़े मेढ़े आंगन में
रीछ नाच के
ठुमकों ठुमकों टूटे घुंघरू के स्वर,70
भटके भाव पलों के खीटे उर उझरीटी
बेल की खींची कलथी
घायल घेंटी
निधड़क नीछें बेच बाजार हया डर,70
भरे पेट नंगदांव हेडियों कान मरोड़ी
उत्साही उत्पात
पड़ा मूड़े माथे
जस चुंदी चढ़ी चुड़ैलों की किलकारी !71
सांकेतिक शब्दों की हृदय हिलोरी राग रागिनी
जहन जीभ से गायब
ओंठ अड़ी
अपमान ककहरा रट लिया जतन से,70
सन्निपात पथ पांव रुके न हठ जिया
जिया भर
पानी पांव प्रच्छाल छुआ न
कथरी ओढ़ भृकुटियां टेढ़ी रहीं वतन से,70
मुद्दे मूड गठरियों गांठी खोल गिनाते
जैसे भारत गढ़ा इन्होने
नभ धरती की
गतिविधियां हैं इनकी रचनाकारी !71
बदले मौसम की इस तेज धूप की चमक में
कान उटेरे
जख्मी जज्बात सुनें न
अंधियारों से जिन्नातों की बोली,71
बिखरे बिपरीत दिशाओं के थक हारे
मनभाव क्षणों के
खुले चक्षु टकटकी दृष्टियां
धीरे धीरे उत्तरायण की हो ली, 71
आंख में आंखें डार टटोली नब्ज रोग पहचान
पथरियों
चंदन जैसी
घिसी बूटियां तब तन मन की घटी बिमारी !
भोलानाथ
टेढ़ी भौंह टेढ़ टेढ़ गया
टेढ़ी भौंह टेढ़ टेढ़ गया समय साल
महुआ सा कूट केक्या करते
गली गांव फरका से रूठ के !
स्यासा का घूर लगा अटा आंगन में
धूर धुआं
हार थक
हांफती गिलहरी खोखल में ठूंठ के !
मनभावन अवसर का शव लादे
कन्धों में
सूर्यरथी लीकों की धूल में
उम्मीद ओढ़ी दरी सी बिछायी,
आत्म रक्षा की कोशिश मेहराब की
छिन्न भिन्न धूप सी
अस्मिता का
युद्ध हार सांझ ढले हाशियों में आयी,
परिधि व्यास वृत्त के आवर्ती फेरे
दिनचर्या चाल की
चली चाल
पांव नहीं दिखते हैं झूठ के !
आगत के स्वागत सत्कार की
पुलकावलि
बिगड़े मौसम की झंझवाती
सांझ की संझवाती द्वार धर रही,
शुभकामनाओं की सुरभित सुवासित
उत्साह अर्चन के पुष्प पत्र
अक्षत सा
भीतर की मुंह बोली प्रीत झर रही,
कसालों के कांटे चुभे पांव
चल के
आंचर की झोरी चुने
बेर पर वर्क से लेप हैं जूठ के !
बेजर दुरुस्त है हाजमा खट्टा मीठा करु
सब पेट में
पचा के
जी लेते हैं डांगर सा ढांचा गला के,
ठोकरों के आदी मिन्नतों के घूर नहीं
खरभराते खर्रा में
लेटे हैं
वक्ष की अंगीठियां जला के,
भिन्न भिन्न तुर्रे तब्दीलियों के तेवर
आपदा के
वक्त में
ठाढ़े मरे जैसे मारे हों मूठ के !
भोलानाथ
जाफरी के परदे खिसका के
जाफरी के परदे खिसका के
चढ़ते दिनसोने का
स्वांग छोड़ बाहर आ होड़ के !
राममय नेपथ्य की नकार नहीं
धारण कर
वक्ष में
हिकारत की हेय हिया छोड़ के !
उधर उधर निकर गई फ़ांस की
आखरी कनी
रबा रबा स्मृतियां आंस की
जहन जिगर से खखार के निकार,
शदियों की त्रासदी से उबरे उराव की
धूम में
झरने दे सावन सी
मनभावन उत्सव की बाबरी बहार,
खंड खंड धर्मी उन्माद को
आने दे
वृत्त में
बे मेलों के छोर सिरे जोड़ के !
आसुरी अवसाद अंटी बड़ी बड़ी काली
परछाईयाँ
रौंद रगड़ लौट आये
राम फिर विराजमान तख़्त पर,
अताताईयों का वंश मिटा शेष अंस
हारा है रगड़ रगड़ एड़ियां
जोर नहीं
शरणागत चिन्हित है वक़्त पर,
विधान विमुख बाज को दिखे नहीं
बनी बिगड़ी
लीक में
छाप चिन्ह वनवासी गोड़ के !
पुण्य के इस यज्ञ में आहूत नहीं
जिनकी आहुतियां
उतारे जा रहे
बाल की खाल बारी बारी बे थके,
ओढ़े लिबास के भीतरी विलास का
बनावटी विलाप
सुनते सुनते
रमधुनियाँ कनपरदे कान कान के पके,
एड़ियों की गोखरू निकाल दिया
समय सुई की
पैनी नोक ने
जड़ गहरी कोड़ कोड़ के !
भोलानाथ
गुणीजन को जाने दे
गुणीजन को जाने दे सरपट सड़क पर
धुंधली रजत रेख सीलीक पर
हन्ना गुन्ना बे मंजिल चला चल अकेला !
मोलाने दे उनको उनकी सफलता
कूता करें चाहे
तौलें तराजू
काम का नहीं तेरे बाजार मेला !
उदघोष नव प्रभात के प्रारंभिक क्षणों की
चित चेतस गति
साध छंदों के मुखड़े
अनुरूप लय के उन्नयनी स्वर दे,
उजड़े उपवन उजाडों के ठूँठे सुनें न सुनें
भीतर फुदकती
कोयल की कूकी
अहसास मधुमासी अमराई धर दे,
छटने लगे नभ कापासी बादल
चढ़ने लगी धूप
फिर धीरे धीरे
खुश्बू की अंगड़ाइयों में है बेला !
बताशा बहस की बर्तुल तमाशा सी
झरती हताशा का
हिस्सा नहीं तू
फकीरी अलख में अनुभूतियाँ जनहेतु कह ,
रत्नों की ख्वाहिस में मथने दे सागर उन्हें
भूल मत
तू भी आदमी है
आदमीयत की रग रग में रक्त सा बह,
भगीरथ प्रयासों की सूखे हलक
या
पसीना बहे देह का
जैसे सावन के पानी में पानी का रेला !
गुथ गुथ चंदोबा सजाने दे कलगी
उगाने दे
अंजुरी में राई उन्हें
रहने दे चर्चा में चढ़ती चिलम का धुआं,
सुख दुःख दिवस मास मर खप के जी पूरा
रेतीले वन में
भटकने दे प्यास को
प्यासी ओठों में भर के प्यासा कुआं,
जन्मों की पिटी पीठ सहला के हाथ से
उजागर कर
छूंछे पेट की
बे रोटी तवा छूंछ दाल का तबेला !
भोलानाथ
राखी भरी कलाई काम न आई
राखी भरी कलाई काम न आई
कर्तव्य पथों परलीद उठाते
खप रहे भोजपाल के शाह !
हवन किये अंगुरी जली
धुआं धुआं आकाश
शाहंशाही
गई हाथ से अमरबेल की राह !
छीना झपटी द्वन्द में हारे ताज सितारे
खुले मूंड में
ओलों की बरसात
हवा में पाग पैंतरे लत्ते लत्ते,
अपराधों की पोल न खोले
चढ़ते दिन की छांव
बेड़ियां पांव में डारे
पतझर का ऐलान हंसें सुन पत्ते पत्ते,
विस्थापित पग पगड़ी पीर पचे न
पेट के भीतर
रह रह पनपे
जहन जिया में जले सौतिया डाह !
उज्जैनी की भूली बिसरी राख की
आग दगे न
सुलगे वक्ष रुके न खांसी
मींजे मसले चुभे रेत सी आंख,
रिस्तों का रस पिया जिया मन
फबे नहिं
फतवों के पीसे जतवों का
मनभावन चूरण सरके गठरी कांख,
बरगद की जड़ समझ के पकडे रहे
जकड़ के जिनको
उनने ही
खाई खौंदी केसर बोई बाह !
समझ सल्तनत के आडम्बर
भेद भाव की स्वर्ण जंजीरो में
जकड़ रियाया
मन की खोट न बाहर आने दे,
भूल भुलैयां ब्यूह बधे अभिमन्यु जैसे
राष्ट्रभक्ति
निर्भीक लीक
संघर्ष चेतना की लयराग न गाने दे,
प्रभताई की गंध गली से नाक दबा के
निकले जत्थे
लखा न पूछा
न ही चिन्हित किया गुनाह !
भोलानाथ
सीधी सड़क अजीब मुखौटा
सीधी सड़क अजीब मुखौटा
चलता उलटे पांव !ताल ठोक न भाग यहां से
यह मुर्दों का गांव !
हिले डुले न देह बे पानी
पुतरी नचती आंख
नब्ज दिल
धक धक धड़के
बाण बिंधे से प्राण कल्हारे,
थके हाथ डुगडुगी बजाते
करवट कलथी
चेत दिखे न
टिटरी मार कुहनियां
मुड़ी मुड़ी न पांव पसारे,
लाघव लोच अबोध राग के
औंधे परे निधांव !
मुन्नाहट बगदरी कान की
झरे न झारे आयत आन
जहन के भीतर
अधपक
खिचड़ी दगे न चूल्हे आग,
पुलिया पांव पहुँच के बाहर
धूमिल धूमिल धुंध ढोंग कुछ
पढ़ा न जाये
लिखा
लिलारे कोल्हू पेरा भाग,
आग बरसता सिर का सूरज
पावों लिपटी छांव !
बांधव बंधुल पीठ के भाई
बंधे बांह से
गुपचुप
जहर उगलते
बखिया फारें घुसे घुसे अस्तीन,
जय विजय पराजय ओढ़ मरे न
हिंसक रहे जनम भर
जबराजोर
अडी में
फटी वक्ष की दरियादिली जमीन,
कांईठ करु हरु किल्लत में
कांखे गांव गिरांव !
भोलानाथ
न तुम कुछ कहो न हम
न तुम कुछ कहो न हम कुछ कहें
बस देखते रहेंमौन बौरों सा
गली खोर उंच उंच होड़ नंगदांव की !
न बदली कभी न बदलने की उम्मीद है
धीरे धीरे
वसूल रही
धूप कराधान सी शीतलता छांव की !
ऊबी में सूरज सोचे न अपने ढलान की
अमावस के
रोशन दिये
फूंक ढिबरी सा गुड़ खांड गोबर किया,
जुमलों के जाहिर पिटारे के सपने
युवावों की
आखों में आंजे
बुजुर्गों की पूंजी घी सा पिया,
आशीषे हृदय हांथ गुड़ खाते चेले से
पूंछे
फेंकी खड़ाऊं
कहां किन कोरैयों में पांव की !
गारंटी गायन की वारंटी रही न
फिर लौटी
जुमलों की बारिस
पेट बांधे युवा बाढ़ बूढ़े बहेंगे,
जिद में है राजमुकुट मरते की
फिकर नहीं चिंता है
मन मुसेस
बाराती बारात की और कितना कहेंगे,
दावे बहुत हैं दया के दयनीय
बाखें पसलियां
चिन्दी चिन्दी
चड्डियों में घायल है लय गांव की !
पौ पूरी फटी नहीं झलरी हवाओं में
बेलगाम घोड़े
सूर्यरथ जुआ के
दुआधारी उड़ते बछेड़े,
राजसी रवायत के गिरगिट
बरगद की छांव छोड़
गालों में
दाबे कबीरी ओठों ओछरते बखेड़े,
दंडवत की मुद्रा में पीड़ा मरोड़ की,
बूटी वैद्य
फिरें नहीं
रोजमर्रा सी आदत है आंव की !
भोलानाथ
गांव गली चौबारों का फागुन
गांव गली चौबारों का फागुन
मेरे हिस्से का जी भरतुम भी जी लेना
अधगादर खेत लहरती बाली सी !
वेद समझ इस चित्र का मुखड़ा
रोज पढूंगा जीवन भर
तिल तिल प्यार का
द्वार खोलती गाल की तिल काली सी !
उपवन भर की महक गुलाबी
मक्के मड़वे की रसभरी सांस
फुलझड़ी दिवाली
पूस फ़ूस खरभरी बिताई रातें,
करना याद गुलाल मले गालों की
उड़ती हवा अबीर
रंगीले आंचर
चुये प्रसंग बिरौनी आंख की बातें,
चुन्नी चुन्नट चूहों का जनमास है
जब से
छप्पर छोड़ गई है हज को
जानी पहचानी वक्ष बिलैया पाली सी !
दोहनी दूध निचोई फेन भरी सी
देह दिखाई आदिम पर्व की
वन्दनवारी
छोड़ सलीका कूद चढ़ी घिरघोरी,
समय सगुन हल्दी अक्षत आंगन
छत विक्षत सुदिन साख
पंचांग की आयत पढ़ पढ़
टूटी कच्चे सूत की पक्की डोरी,
चौके चौरे चर्चाओं के मुख चर्चित
चढ़े पमारे
घूर उघन्नी
ऊंघरी आंखें ओंठ जड़ी ताली सी !
दाढ़ी मूंछ वक्ष के पके बाल की
नरम शाल
बेरंग रही जो ह्रदय के भीतर
थाती जैसे धरी तुम्हारे नाम,
दग्ध पलाशों के जंगल में भरी अंजुरिया
गुलाल उछाल हवा में
अलबिदा कहूंगा
धुंधरुक धुंधरुक शाम,
केंद्र में कविता के तुम रही सदा
गाया गीत परिधियों का
खुद सुना नहीं
लय लगी सदा ख़ाली ख़ाली सी !
भोलानाथ
शेष बाढ़ बूड़े के
शेष बाढ़ बूड़े के मुड़थपिया दलदल से उबरे
साहसी पताकेडोर कटी
बहती पतंग सा परनाली धार में बहे !
आसरों के आसरे में जानबूझ उतरे
अबूझी लहर की बहर में
सुनते हैं
धार कटे तिनकों के काले कहकहे !
बाहरी गुरेर के फेर फिरे वक्त की
छूटती अंगुरियों के पोर पोर
आखिरी
छुअन का अहसास अंकित है वक्ष में,
परचित सा परहेज माथे से माटी की दूरी
अधूरी तिलक का
गौरव बिमुख
जिया डारे जिये खूब गंधाते कक्ष में,
भटकती रही अक्ल ऊसर में
घायल उलूक सी
ख्वाहिशों के पिंजरे में
झूले सुबह शाम तोतिया रटन राग रटते रहे !
आहत अहेरियों की मधुमाखी
संचित शहद
और कितना परोसेगी
गली कूच आवारा कूकुर बिलैयों के आगे ,
जली भुनी मुन्नाती चुचुआते छत्तों में
लौटेगी कब तक बिवसता
रस की निचोई
आगी धुआं धुंध रह के न जागे,
सहते जुलुम बहुत बीता समय
गुंजाइस नहीं अब जिरह की
पेंचों के बाहर
परपंची बाड़ों में खुल के हित की कहे !
उड़ती चटाई विलासी खटोलों में उड़ते
सिलबट्टे
निखालिस मलाई
मसालों के झांसों में हल्दी सा कूटें,
घिस घिस के बूटी बिसरी न
दादी की घूंटी पिलाई
नानी के कजरौठे का काजल
केशर तिलक पानी धोये न छूटें,
बाजारू बखत की बोली बिके न
लुटे ठाढ़े ठाढ़े
उछलती रही पगड़ी इन उनके हांथों
कल्पे कुपित मन कलुष के सहे !
भोलानाथ
चिल्ला चौंथी मत कर
चिल्ला चौंथी मत कर खोंस पटौती
जंग लगी पुस्तैनी रांपीखींच और न
आग झुलसती सोये जहन की खाल !66
हिम्मत कहां किसी में रोके कोई
दिन दिन बढ़ती बेरोजगारी
जनसंख्या
विस्फोट पिठाहीं लदा हुआ बैताल !67
घोड़ गधा मन मतान्तरी के हाथ हथौड़े
फोड़ भीड़ न
किरचा किरचा कांच के जैसे
प्रेम पंथ पग त्याग मरोड़ न बांहें,74
नूरा कुश्ती खेल का कोलाहल चल रहा
निरंतर ,चक्रबृद्धि के मकड़जाल की
फेरा फेरी
लुटी रवायत लांघन भरी निगाहें,74
पेट नाभि की गूढी गूढी पापड़ बेले
भूख रसोई
छप्पनभोग के पीढ़ा आसन
पंगत बैठे भिन्न भिन्न घड़ियाल !67
पन्ने पलट देख न रपट लिखाई
मृगछलना सी छले धूप में
लीक लीक का भौदा
भूँजे नीक सूख के चीकन चांदन पांव,74
खपरैलों की खबर लिखें न आंधी पानी
जले खेत खलिहान
आंसुओं का
शैलाब थिराना बूड़ा बाढ़ में डूबा गांव,74
जनम जनम के मथे समुंदर की लहरों में
तितर बितर चुटकी भर
डाल के दाना
राजा फेंके मछली वाला जाल !67
बिजली गुल है झल पंखा झल
देख न सपने खुली आंख के
बंदर बांट विचारों वाली
पगड़ी पाग में राज मुकुट नहीं सजना है,76
चिल्हर वाला समय रहा न इमली वाली शाम
फागुन फ़ाग मुड़ौसों धरके
पिये भांग
दिन रात ढोलकिया राग मजीरे सा बजना है,76
मुंह फूंके आकाश उड़ा न चेहरे चिपकी
धूल हटाते हाथ थके न
टूट टूट कर
झरे बिरौनी अधपक अधपक बाल ! 67
भोलानाथ
चिलकी पीर अधीर गिरानी
चिलकी पीर अधीर गिरानी कुछ बदली
कुछ फेर समय काचढ़े खजूरी खास
और अब चुभता नहीं आंख का पांव में कांटा !
चरती खेत मेड़ भय खाती बाड़ सलामत
रकर चौकडियां
भरे कुलाचें
बैठ भैंस पगुराती खोज में चारा के है नाटा !
बादर बूँद हवा बैहर की जतकत कौंध
बिजुरिया
मिटे धूर में पूर
धरती लोटन पाग पगड़ियां बंधी हैं मूड़े मूड़े,
बेखौप नचें न काठ पुतरियाँ अंगुरी के उकसाये
बे भय
ख़ुशी बेटियां
चहकें रनबन बांध के साहस गजरा जैसे जूड़े,
गरम खून के बहके पांव बचाव कथन के
बिम्बित खोट
मुखौटों धारी
बीते वक्त के गालों पर है वर्तमान का च्यांटा !
नून लकड़ियों जली गकड़ियों बे छत छप्पर जसतस हुआ गुजरा
शक़्कर खाँड़ मिली न
और मिली न पांत पतरियों गुड़ की भेली,
गिला किया न ठौर बेठौरे रोये,कोल्हू पेरी
तेल धार के
चोर उचक्कों की
मुड़फोरी का उकताया लाठी भांजे तेली,
खिंची लकीरों बंधी डोर की गांठ खोलते
भेद किया न झुका झुकाया
सम्मुख का
संवाद समय पर देहरी द्वार न बांटा !
आरोपों की झड़ी में बूड़ा बहा न भीगा
फ़टे नहीं बकवास के बादल
पवन पटीली पीठ
हिलक हल्दी सी घाव में आई ,
अंधभक्त कहलाने वाली सौम्य रियाया
धीर वीर सी जगह जगह से घायल
आजादी की
बांह पकड़ कर सिंहासन तक लाई,
चोरों की बारात के बाजे मौसेरों की
राग
फ़ाग सी दुलदुल नाचे
दूल्हे की पड़ताल झांपियों में है लाग लपाटा !
भोलानाथ
तम्बू तारन तान तमूरा
तम्बू तारन तान तमूरा सारंगी पर झूम
कूद कचर न झोपड़ झुग्गीऊंची ऊंची मलखमियों की
उंच अटारी ऊंचे झंडे नहीं जेब जागीर !
फ़ैल पसर न चौका चौरे लात लथेड़ी मुड़भेली में आसमान नहीं बंटने वाला
पत्थर मार लबेदी
ललकारो से क्षितिज सितारे तोड़ सके न वीर !
दूर की कौड़ी का सुख स्वांग भुनाने वाले
अलख फकीरी के
किरदार मुखौटों चुपरी
झरे अबीरन किरचा किरचा लीपा पोती,
निश्छल हृदय जहर पी पेट मरोड़ की पीर
पचा पहिचाने बिच्छु ब्याल डटइयाँ
बाड़े भीतर
घूम रहे जो गिरगिट लील के मोती,
बंदरमुखी मुख लोक लुभावन ओंठ की चुपड़ी बात बलैयों
बतकही हवा की गाल गिलौरी
पान चबाती
दिशाधुन्ध में फैली पसरी पाखंडी तासीर !
छू मंतर सा समय हाथ का बे प्रज्ञप्ति
उड़ गया न लौटे खोंपा मोगरी छोड़
बसेरा
बुनते बुनते डार डार की मरी चिरैयां,
ऋतुओं ऋतुओं धूल नहाती पता न पूंछा
बहते जल का
झंझावाती बसर की
हिलकी गाते गाते आँखों भरीं तरैयां,
घाट घाट की दानाडारी पुण्यकमाई
हांथ उंगलियां बांध बांध के
मुट्ठी घुमके हुमक हुमक के
हने पेट में धंसा करेजा आश्वासन का तीर !
नीर नयन भर शेष सम्पदा मुख मोहर
गिरवी धर मोल बिसाही
गुमनाम गुलामी
हुकुम की ड्योढ़ी हिलता मूंड उठी न आंखें,
हां में हां की मौनमुखी फरियादी सूची
पढ़े सुने न देखे सुस्त व्यवस्था
पिचका पेट
घिनौची प्यास घैल सी कलथी बांखें,
सुबह शाम सैलाब सड़क का जन सम्बोधन
स्वयं प्रभा की अजमाईस के अगुआ
लांघ लकीरें फिरें पकाते
ख्वाब की खिचड़ी हंडियों हंडियों खीर !
भोलानाथ
डटे रहे लीक से
डटे रहे लीक से हटे नहीं तितिर बितिर उपले उबेलों की
तपते घमेलों की छू छू सतहकौन लौहपथी गिट्टियां हटाता !
विलासिता की दौर से किसे पड़ी
जूझे जो गांव की हड़ौर से
बूंद बूंद विथा व्याध
कान कान गाते तो और मजा आता!
बरसाती बाढ़ का उफनते आषाढ़ का
पूस के कंपकपाते हाड़ का
जीते जो जेठ की प्यास का
समुंदर सुरक कर फिर कहते ओंठ की ,
बड़बड़ की हड़बड़ कथन में छूटी कहन
पूरी पूरी
मूंडे उठाती चिलक भूल जाती है
थूका खखारा पीक पुरीआंगन बरोठ की,
फीकी फीकी चमक मुख बांहें चढ़ाये
मुंह के धनी
शाम धमकाने सूरज को
दौड़े चले आते हैं ओढ़ ओढ़ बरसाती छाता!
करतूत कुरुओं की पईलों की खा के
भांते रहे ढेरा
चरखे की आमद खुसामद गिना के
पकाते रहे खिचड़ी चांदी की हंडियां ,
धुंधली नियत धुंध सरकी धजी न
बामी समाई रेरी की फेरी अहेरी
अखाड़ों की लोटी
लठैती पटीले लकीरें बजा के नगड़ियां,
उड़ती खबर खोंपा मोगरी का कौआ
उड़ उड़ के आंगन अहाता
अपनी जुबानी
सन्देश मईका का अम्मा के कानों सुनाता !
वंशधर पतिंगों की पोंदीपैया में जूझे
जखीरों को
फुरसत नहीं जो उंचा निहारे
आकाशगंगा की बोई झिलमिल तरैयां,
मौनी शहर के मुखरित हुनर को उंचे शिखर की हिलती हिलाती सतह से
बांधो न बंधु और
काम की नहीं हैं यज्ञोपवीती गिरैयां,
अच्छा होता हिकारत हटा कर हृदय से तस्वीर प्रातिभ जनों की
जलसा जुलूसों का दर्पण
क्षेपक सफा की सुरतियां दिखाता !
भोलानाथ
खाई खुदरी
खाई खुदरी समय की खंडित उमर कर्ज सी
जो चुक गई
जूठन सी छोड़ी बची थोड़ी थोड़ी
हथेली हाथ ख़ाली खींसों न आई !
उम्मीदी झांसों दिलासों की ऊबी उबासी
लुहर भट्ठियों की
लाल लाल लौह सी
कुटती रही ठाढ़ी ठाढ़ी ठंडी निहाई !
आधा अधूरा पहिचाने चीन्हे आकार को
पहचान देने की मन में पाली प्रतिज्ञा
होम हवन
गंधमादन फुलहरा के नीचे पारण सी टूटी,
ओहदे बदलते बदली हैं हूंकियां गरू देह पाढ़ें
चढ़ चढ़ के पिडरी पसुरियों
हचर मचर
मचवे की कलथी करौटों की कांखन न छूटी,
धुआं धुंध आंखों की धुंधरुक में अपनों के दावे दबी
दाढ़ चाबे चनों सा
गुटकती गुड़ घी की चुपरी खुद की परछाईं !
पंख आते उड़े अंश लौटे नहीं, खुद कांपती अंजुरियों का भार नहीं उठता,
घरुये का तीन तीन तिनका
किस लिये और अब नया द्वार खोलें,
मुमकिन नहीं लौट आना फिर से समय का
आकाशी घेरे के नीचे
गेंद सा लुढ़कते रवि को
सोखी नदी का कैसे पानी उगलने को बोलें,
ढर्रे बे ढर्रे हाथी निकल गये अरझी हैं पूछें
हौदों के
हिचकोले खाती
बसर की उघन्नी टेंटों की खोंसी छुपाई !
आगे कुआं पीछे खाई पुरी न पक पक झरे
तन के बाल सारे
बढ़ते नखों की सिहरन मिटी न
झरा नूर चेहरे का उड़ा रंग तन फीका फीका,
बेचैन पिंजरे का पंक्षी गिनता रहा दिन रोजदिना
तोड़े बहुत पंख पिंजरे से लड़ लड़
अधूरी रही
मन की, बिल्ली के भागों टूटा न सींका,,
उड़ने के सपने आंखों से हारा बिराता रहा
खुद
खोखल का मायावी चिंतन
सांसें थमी न थमी मन से मन की लड़ाई !
भोलानाथ
चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
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जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं उस दूर दराजी प्रीतम को यह संदेशों की पाती ! हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित तू ही बनजा दूत रे बदर...
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जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...