खाई खुदरी समय की खंडित उमर कर्ज सी
जो चुक गई
जूठन सी छोड़ी बची थोड़ी थोड़ी
हथेली हाथ ख़ाली खींसों न आई !
उम्मीदी झांसों दिलासों की ऊबी उबासी
लुहर भट्ठियों की
लाल लाल लौह सी
कुटती रही ठाढ़ी ठाढ़ी ठंडी निहाई !
आधा अधूरा पहिचाने चीन्हे आकार को
पहचान देने की मन में पाली प्रतिज्ञा
होम हवन
गंधमादन फुलहरा के नीचे पारण सी टूटी,
ओहदे बदलते बदली हैं हूंकियां गरू देह पाढ़ें
चढ़ चढ़ के पिडरी पसुरियों
हचर मचर
मचवे की कलथी करौटों की कांखन न छूटी,
धुआं धुंध आंखों की धुंधरुक में अपनों के दावे दबी
दाढ़ चाबे चनों सा
गुटकती गुड़ घी की चुपरी खुद की परछाईं !
पंख आते उड़े अंश लौटे नहीं, खुद कांपती अंजुरियों का भार नहीं उठता,
घरुये का तीन तीन तिनका
किस लिये और अब नया द्वार खोलें,
मुमकिन नहीं लौट आना फिर से समय का
आकाशी घेरे के नीचे
गेंद सा लुढ़कते रवि को
सोखी नदी का कैसे पानी उगलने को बोलें,
ढर्रे बे ढर्रे हाथी निकल गये अरझी हैं पूछें
हौदों के
हिचकोले खाती
बसर की उघन्नी टेंटों की खोंसी छुपाई !
आगे कुआं पीछे खाई पुरी न पक पक झरे
तन के बाल सारे
बढ़ते नखों की सिहरन मिटी न
झरा नूर चेहरे का उड़ा रंग तन फीका फीका,
बेचैन पिंजरे का पंक्षी गिनता रहा दिन रोजदिना
तोड़े बहुत पंख पिंजरे से लड़ लड़
अधूरी रही
मन की, बिल्ली के भागों टूटा न सींका,,
उड़ने के सपने आंखों से हारा बिराता रहा
खुद
खोखल का मायावी चिंतन
सांसें थमी न थमी मन से मन की लड़ाई !
भोलानाथ
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