गुंजन गीत परागी नद में
बूड़ बसंत सिराने करने लगे फसाद !बूढी काया हाड पासुरियाँ
भर सकोगे क्या फिर यौवन का उन्माद !
सिकुड़ी देह दांत बिन
स्वाद चटोरी जीभ बिसर
पकवान देख
मुँह मुस्का खींच चढ़ाये ,
पुष्प धनुष सर सधे न साधे
लक्ष्य रूप आकार
विविधि सन्दर्भ सार के
रोचक पाठ पढ़ाये ,
बीते जीवन की सडी गठरिया
बड़ बोझ बुद्धि के प्रस्तावित संवाद !
कामकंदला के पग घुंघरू
लय की थिरकन लहर सांस की
साध सके तो साध
माधवानल जैसा संगीत ,
ठूंठ हुए बरगद का पता
पूंछ न मिटें महल
महके पुरवाई धुले कोर न काजल जैसे
अमर आँख की प्रीत,
जाया समय फिरे न लौटे
रिसरिस चुये छपरिया जैसे छाती का अवसाद !
भोलानाथ
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