Wednesday, 22 May 2024

सिकुड़ी देह दांत बिन

गुंजन गीत परागी नद में 

बूड़ बसंत सिराने करने लगे फसाद !

बूढी काया हाड पासुरियाँ
भर सकोगे क्या फिर यौवन का उन्माद !

सिकुड़ी देह दांत बिन
स्वाद चटोरी जीभ बिसर
पकवान देख
मुँह मुस्का खींच चढ़ाये ,

पुष्प धनुष सर सधे न साधे
लक्ष्य रूप आकार
विविधि सन्दर्भ सार के
रोचक पाठ पढ़ाये ,

बीते जीवन की सडी गठरिया
बड़ बोझ बुद्धि के प्रस्तावित संवाद !

कामकंदला के पग घुंघरू
लय  की थिरकन लहर सांस की  
साध सके तो साध
माधवानल जैसा संगीत ,

ठूंठ हुए बरगद का पता
पूंछ न मिटें महल
महके पुरवाई धुले कोर न काजल जैसे
अमर आँख की प्रीत,

जाया समय फिरे न लौटे
रिसरिस चुये छपरिया जैसे छाती का अवसाद !

भोलानाथ 

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