गुणीजन को जाने दे सरपट सड़क पर
धुंधली रजत रेख सीलीक पर
हन्ना गुन्ना बे मंजिल चला चल अकेला !
मोलाने दे उनको उनकी सफलता
कूता करें चाहे
तौलें तराजू
काम का नहीं तेरे बाजार मेला !
उदघोष नव प्रभात के प्रारंभिक क्षणों की
चित चेतस गति
साध छंदों के मुखड़े
अनुरूप लय के उन्नयनी स्वर दे,
उजड़े उपवन उजाडों के ठूँठे सुनें न सुनें
भीतर फुदकती
कोयल की कूकी
अहसास मधुमासी अमराई धर दे,
छटने लगे नभ कापासी बादल
चढ़ने लगी धूप
फिर धीरे धीरे
खुश्बू की अंगड़ाइयों में है बेला !
बताशा बहस की बर्तुल तमाशा सी
झरती हताशा का
हिस्सा नहीं तू
फकीरी अलख में अनुभूतियाँ जनहेतु कह ,
रत्नों की ख्वाहिस में मथने दे सागर उन्हें
भूल मत
तू भी आदमी है
आदमीयत की रग रग में रक्त सा बह,
भगीरथ प्रयासों की सूखे हलक
या
पसीना बहे देह का
जैसे सावन के पानी में पानी का रेला !
गुथ गुथ चंदोबा सजाने दे कलगी
उगाने दे
अंजुरी में राई उन्हें
रहने दे चर्चा में चढ़ती चिलम का धुआं,
सुख दुःख दिवस मास मर खप के जी पूरा
रेतीले वन में
भटकने दे प्यास को
प्यासी ओठों में भर के प्यासा कुआं,
जन्मों की पिटी पीठ सहला के हाथ से
उजागर कर
छूंछे पेट की
बे रोटी तवा छूंछ दाल का तबेला !
भोलानाथ
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