जाफरी के परदे खिसका के
चढ़ते दिनसोने का
स्वांग छोड़ बाहर आ होड़ के !
राममय नेपथ्य की नकार नहीं
धारण कर
वक्ष में
हिकारत की हेय हिया छोड़ के !
उधर उधर निकर गई फ़ांस की
आखरी कनी
रबा रबा स्मृतियां आंस की
जहन जिगर से खखार के निकार,
शदियों की त्रासदी से उबरे उराव की
धूम में
झरने दे सावन सी
मनभावन उत्सव की बाबरी बहार,
खंड खंड धर्मी उन्माद को
आने दे
वृत्त में
बे मेलों के छोर सिरे जोड़ के !
आसुरी अवसाद अंटी बड़ी बड़ी काली
परछाईयाँ
रौंद रगड़ लौट आये
राम फिर विराजमान तख़्त पर,
अताताईयों का वंश मिटा शेष अंस
हारा है रगड़ रगड़ एड़ियां
जोर नहीं
शरणागत चिन्हित है वक़्त पर,
विधान विमुख बाज को दिखे नहीं
बनी बिगड़ी
लीक में
छाप चिन्ह वनवासी गोड़ के !
पुण्य के इस यज्ञ में आहूत नहीं
जिनकी आहुतियां
उतारे जा रहे
बाल की खाल बारी बारी बे थके,
ओढ़े लिबास के भीतरी विलास का
बनावटी विलाप
सुनते सुनते
रमधुनियाँ कनपरदे कान कान के पके,
एड़ियों की गोखरू निकाल दिया
समय सुई की
पैनी नोक ने
जड़ गहरी कोड़ कोड़ के !
भोलानाथ
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