राखी भरी कलाई काम न आई
कर्तव्य पथों परलीद उठाते
खप रहे भोजपाल के शाह !
हवन किये अंगुरी जली
धुआं धुआं आकाश
शाहंशाही
गई हाथ से अमरबेल की राह !
छीना झपटी द्वन्द में हारे ताज सितारे
खुले मूंड में
ओलों की बरसात
हवा में पाग पैंतरे लत्ते लत्ते,
अपराधों की पोल न खोले
चढ़ते दिन की छांव
बेड़ियां पांव में डारे
पतझर का ऐलान हंसें सुन पत्ते पत्ते,
विस्थापित पग पगड़ी पीर पचे न
पेट के भीतर
रह रह पनपे
जहन जिया में जले सौतिया डाह !
उज्जैनी की भूली बिसरी राख की
आग दगे न
सुलगे वक्ष रुके न खांसी
मींजे मसले चुभे रेत सी आंख,
रिस्तों का रस पिया जिया मन
फबे नहिं
फतवों के पीसे जतवों का
मनभावन चूरण सरके गठरी कांख,
बरगद की जड़ समझ के पकडे रहे
जकड़ के जिनको
उनने ही
खाई खौंदी केसर बोई बाह !
समझ सल्तनत के आडम्बर
भेद भाव की स्वर्ण जंजीरो में
जकड़ रियाया
मन की खोट न बाहर आने दे,
भूल भुलैयां ब्यूह बधे अभिमन्यु जैसे
राष्ट्रभक्ति
निर्भीक लीक
संघर्ष चेतना की लयराग न गाने दे,
प्रभताई की गंध गली से नाक दबा के
निकले जत्थे
लखा न पूछा
न ही चिन्हित किया गुनाह !
भोलानाथ
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