गांव गली चौबारों का फागुन
मेरे हिस्से का जी भरतुम भी जी लेना
अधगादर खेत लहरती बाली सी !
वेद समझ इस चित्र का मुखड़ा
रोज पढूंगा जीवन भर
तिल तिल प्यार का
द्वार खोलती गाल की तिल काली सी !
उपवन भर की महक गुलाबी
मक्के मड़वे की रसभरी सांस
फुलझड़ी दिवाली
पूस फ़ूस खरभरी बिताई रातें,
करना याद गुलाल मले गालों की
उड़ती हवा अबीर
रंगीले आंचर
चुये प्रसंग बिरौनी आंख की बातें,
चुन्नी चुन्नट चूहों का जनमास है
जब से
छप्पर छोड़ गई है हज को
जानी पहचानी वक्ष बिलैया पाली सी !
दोहनी दूध निचोई फेन भरी सी
देह दिखाई आदिम पर्व की
वन्दनवारी
छोड़ सलीका कूद चढ़ी घिरघोरी,
समय सगुन हल्दी अक्षत आंगन
छत विक्षत सुदिन साख
पंचांग की आयत पढ़ पढ़
टूटी कच्चे सूत की पक्की डोरी,
चौके चौरे चर्चाओं के मुख चर्चित
चढ़े पमारे
घूर उघन्नी
ऊंघरी आंखें ओंठ जड़ी ताली सी !
दाढ़ी मूंछ वक्ष के पके बाल की
नरम शाल
बेरंग रही जो ह्रदय के भीतर
थाती जैसे धरी तुम्हारे नाम,
दग्ध पलाशों के जंगल में भरी अंजुरिया
गुलाल उछाल हवा में
अलबिदा कहूंगा
धुंधरुक धुंधरुक शाम,
केंद्र में कविता के तुम रही सदा
गाया गीत परिधियों का
खुद सुना नहीं
लय लगी सदा ख़ाली ख़ाली सी !
भोलानाथ
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