चिल्ला चौंथी मत कर खोंस पटौती
जंग लगी पुस्तैनी रांपीखींच और न
आग झुलसती सोये जहन की खाल !66
हिम्मत कहां किसी में रोके कोई
दिन दिन बढ़ती बेरोजगारी
जनसंख्या
विस्फोट पिठाहीं लदा हुआ बैताल !67
घोड़ गधा मन मतान्तरी के हाथ हथौड़े
फोड़ भीड़ न
किरचा किरचा कांच के जैसे
प्रेम पंथ पग त्याग मरोड़ न बांहें,74
नूरा कुश्ती खेल का कोलाहल चल रहा
निरंतर ,चक्रबृद्धि के मकड़जाल की
फेरा फेरी
लुटी रवायत लांघन भरी निगाहें,74
पेट नाभि की गूढी गूढी पापड़ बेले
भूख रसोई
छप्पनभोग के पीढ़ा आसन
पंगत बैठे भिन्न भिन्न घड़ियाल !67
पन्ने पलट देख न रपट लिखाई
मृगछलना सी छले धूप में
लीक लीक का भौदा
भूँजे नीक सूख के चीकन चांदन पांव,74
खपरैलों की खबर लिखें न आंधी पानी
जले खेत खलिहान
आंसुओं का
शैलाब थिराना बूड़ा बाढ़ में डूबा गांव,74
जनम जनम के मथे समुंदर की लहरों में
तितर बितर चुटकी भर
डाल के दाना
राजा फेंके मछली वाला जाल !67
बिजली गुल है झल पंखा झल
देख न सपने खुली आंख के
बंदर बांट विचारों वाली
पगड़ी पाग में राज मुकुट नहीं सजना है,76
चिल्हर वाला समय रहा न इमली वाली शाम
फागुन फ़ाग मुड़ौसों धरके
पिये भांग
दिन रात ढोलकिया राग मजीरे सा बजना है,76
मुंह फूंके आकाश उड़ा न चेहरे चिपकी
धूल हटाते हाथ थके न
टूट टूट कर
झरे बिरौनी अधपक अधपक बाल ! 67
भोलानाथ
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