Wednesday, 9 November 2022

व्यूह परिधि के हाहाकारी

 व्यूह  परिधि  के हाहाकारी 

साक्ष्य के  अक्स  

आँख  किस  आँख  को  दे  दे  | 


जुमलेबाज शिविर का  

है  क्या  कोई  धनुर्धर  

चील  चीख  सुन  लक्ष्य  जो  भेदे | 


किरदार  द्रोण  के  बने  रहे  वे  

थके  न  हारे 

पिछलग्गू  जन  

झुक  झुक शीश  नवाते , 


कुओं  के  बाहर  क्षितिज  देख 

ऊँचे  

सिर वाले  

ऊँचे  रहे  सदा  टखने  मिजवाते, 


भेंट  मिली दुदकार फतोहीं  

देह  ढके  या  

ऊब  उबासी  कन्धों  रे  दे |


उखड़ी नाभि  की  करकस  पीड़ा  

नस  नस  चिलके 

ऐंठे  पेट  

न  छूटे  हाथ  का  लोटा, 


मींज मसल  पिड़री की  मालिश 

वैद्य हकीमी 

विफल  

बिराये  खूंटी  टंगा लंगोटा, 


गोबर  गुदड़ी  

पुआल  पला सच  

बिलों  में  पलते चूहे सांप रगेदे | 


पग  पग  पर्वत  जैसे  

अवरोध हटाते 

झरा  पसीना  

समय सार जीवन का  बीता, 


भूले  बिसरे  शिलान्यास पढ़  

चरणबद्ध  पग  

काट  रहा  है  

लोकार्पण  का  फीता, 


सूरजमुखी  बिहान  चांदनी  

रात तरैयां  

जुगनू  जैसे  क्षितिज  के  गेदे | 


भोलानाथ

Monday, 18 July 2022

बरगद के नीचे

बरगद के नीचे कौओं का 
हगा बीज 
उग अंकुरा पतवार मरेगा 
मधुमास तो आने दो ! 

काई कांदो चौमास चकौड़ा 
सावन भादों के 
उमस भरे दिन 
अनुज इन्हें हरियाने दो ! 

बेल बौल चढ़ डाली डाली 
धूप चमकती हथकड़ियों सा 
कस फुनगी पेढ़ी 
उलहन विवस मायूस लौंचियाँ,
किलकारी भर पांव पैजनियां 
पौढ़ पालने 
ऐडी ऐडी खौंद गदेलियाँ 
बालकृष्ण सी बाँह पौचियाँ, 

नंद महल सा उत्सव उत्साह 
दशहरा भोर 
गोधूलि दीवाली 
माखन मिशरी भोग लगाने दो ! 

डांग बंधी दधि हंडिया ऊंची 
कलाबाज उस्ताद गिरेंगे 
टूटेंगे मुख 
जीभ कटेगी निज दांतों से,
अखरा ओंठ नहीं फूटेंगे 
होगा हलक मरुस्थल जैसे 
फागुन के रंग नहीं 
निथरेगा मल आंतों से,
खड़िया लेप उड़ेगा झर झर 
चेहरे से 
उज्जैनी के पाखंड को 
बड़भागी क्षिप्रा के घाट नहाने दो ! 

गिरगिट का किरदार निभाते 
मठाधीश रौंदेंगे 
कबिरा की और मौलिकता 
तरबे चांट जियेंगे गोड़ गुलामी,
जाति धरम कुनबों में बंधे न बांधी 
बौद्धिक क्षमता 
अविरल बहे नदी सी 
आती जाती क्षेपक रही सुनामी, 

मेट सकी न श्रजन प्रकृति का 
तहस नहस उत्पात की 
लीला का 
खुद उसको इतिहास बनाने दो ! 

भोलानाथ

Saturday, 25 June 2022

सीके से व्यामा की दूरी

सीके से 
व्यामा की दूरी  
ठाढे ठाढे बिलैयां 
पहिनती हैं शोहरत के माले ! 

चंचल छली 
चापलूसी के माहिर 
श्रीफल उपन्ना 
ओढ़ाते हैं चूहे चढ़ चढ़ के आले ! 

दशकों के लटके 
झटके कला के 
देखता रहा 
और सुनता रहा 
गूंगे बौरों सा सारा शहर,
गहराई गीतों में 
झलकी नहीं 
लोकगीतों के शिल्पी 
सुनाते रहे 
एक जैसी बहर, 

जाल बुनती रही 
ठाठ मलगा कोरैया 
मनमानी 
मकड़ों की टोली घर बैठे ठाले ! 

पंजे घिसे 
खंभा अब भी सलामत खड़ा है 
खिसियानी खीझों से 
डर के 
पहिने न दुनिया सुथन्ना,
तलवारें टूटी 
घीचें कटी हैं 
बहती रही नदियां नारी 
इतिहास जीवित है 
ओढ़े उपन्ना, 

मौसम खुला है 
न आंखें दिखाओ 
नचाओ न बादल 
उंगलियों में फिर काले काले ! 

मुकुट बादशाही का 
फिर लौटे मुमकिन नहीं 
म्यूजियम में रहने दो 
तीर तोप
तरकस तलवारें ,
जागी अधजागी 
करवट कवायत का 
व्यूह तोड़ रैयत का साहस 
सुने नहीं 
ओछी ललकारें, 

कबीलों ने 
काट दी अस्तीनें 
काम नहीं आयेंगे
जयचंद टोपियों के पाले ! 

भोलानाथ

Tuesday, 14 June 2022

रुका न रोके नभ का सूरज

 


रुका न रोके नभ का सूरज
शिखर चढ़ा है
कोई खबर करो !

अहम अंधेरों की
दर बदर बदरिया
दीपक द्वार धरो !

मानसून मजमून लिफाफा
खुला नहीं
पढ़ रहे विदेशी नई कीर्ति के
रोज नये अखबार,
भ्रमित भटकते संसय जैसे
मेघदूत का यक्ष अचंभित
देख नदी सी
आम्रकूट रस धार ,

शोध पत्र फट रहे
पुलिंदे कखरी
पकती पुतरी पीर हरो !

बदल गये हैं
राजपथों के अश्व रथी रथ
बग्घी म्याना
जजबाती हो गईं उंगलियां,
तहस नहस संदेश हवा में
बेर की डारी
फतवा बांचें
नीम बकायन की गलगलियां,

आंजत आंजत काजर
कानी हो गई
पानी आंख भरो !

ताने खड़े गुलेल
सरग में छेद की खातिर
लक्ष्य जहन का
जैसे चारों खूंट बिजूका,
आंख सधे तो
उजबक मुह खुल जाये
मुरबा मींज क्षोभ रंज का
जोर जतन छल बल सब चूका,

मुट्ठी कसी तसल्ली के
घर सावन सा
रिमझिम खूब झरो !

भोलानाथ










Saturday, 30 April 2022

जरूरी हुआ तो

जरूरी हुआ तो 

पलट पेज देंगे 

जीवन का अपने ! 


तजुर्बों की खातिर 

छोड़ी खड़ाऊं 

खड़ी धूप तपने ! 


गिरवी में डूबी 

निगाहों के कर्जे 

मरुस्थल में चल कर 

चुकाने की कोशिश में 

पतझर के जैसे 

झरे बाल सिर के,

पछताबा नही 

बस अफसोस है 

नम आंखों का पानी 

पुतरी में सूखा 

झरा नहीं 

झरनों सा कोरों से तिर के, 


अल्फाज आये न 

ओठों में 

चुग गई गौरैया सपने ! 


इतिहास बनते जो 

चौराहे फरकों के 

किस्से 

चौपाली चर्चों के 

पर्चों का मुह बंदर 

अंदाज डारी का चूका,

अंधा समपर्ण 

मतलब परस्ती की 

चूसी चबाई 

गिलौरी की लुगदी के जैसा 

आंगन 

बरोठा है ओंठों का थूका, 


हृदयहीन आफत 

लादे पिठाहीं 

लगे पांव कपने ! 


गौर गोबर न समझे 

समर्पण 

अंतस के रंगीन अक्षत 

चौगिरदा घर के 

किरचा करसी के जैसे 

जतकत बिखरे पड़े हैं,

तिरस्कृत निगाहों की 

अनदेखी कर के 

घिस घिस चंदन पथरिया

अंगुरी अंगूठा 

लिलारे 

लगाने की जिद पर अड़े हैं, 


आहत आहूतियां 

बेआग

लगी भीतर ही खपने ! 


भोलानाथ 


Sunday, 9 January 2022

पहरेदारी चेत

पहरेदारी चेत 

सचेत चौकियों के
संज्ञानो की
सेंध करेगी
हरदम साँस की चोरी !

पन पहचान की भूल हुई
तुमसे भी
अब चूक समय न
चाब चने खींसा के
मत कर मूडाफोरी!

धो कर देह
निकाल नाभि का मैल
मलाई लीप
गैल का गोबर घूरे डार
मत गिन घनी
देख तेल की धार,
कोल्हू बैल खली के मुद्दे
भूल बिसर पल भर
तिल की
घोंघा टिड्डी
पत्ते पत्ते
पड़ी जुरैयाँ मार,

अल्लाख्वाह अखाड़ा
मंत्र महंती
रार मची है
द्वारे द्वारे
भात का भूखा गैल अघोरी !

पेट पचे न कढ़ी
बेल को
हाथ पसारे
रोग विथा बीमारी के
रोक थाम के लिये
घोट घिस नीम पिला,
रोगी सुमिरैं
स्वाद दवा का फेर सुमरनी
उठ भिन्सारे
गावें गीत
बजावें ढोलक
लयसुर मूंड़ हिला,

मुह का मुस्का खोल न बोलें
लिख पढ़
सिख समझ कायदे
संस्कार के
छोड़ें दांत निपोरी !

हिचक छोड़
सब एक ओर धर
कृष्ण के जैसे बांस बंसुरिया
भेद न कर
साध सुदर्शन
काट कांद सी घीच,
चक्रव्यूह षड्यंत्रों के
नक़्शे नक्काशों की
जांच परख
तय कर फिर
सह शाजिस
ठौर ठिकाने फीच,

करिया कबरा फक्क सफेदी
झक्क दाग़ का
चिन्ह बचे न एक
धरती दामन
चमके खोरी खोरी !

भोलानाथ 

Friday, 7 January 2022

देख रहा हूँ आंख के आंसू

देख रहा हूँ आंख के आँसू

दया भाव मुख
अपशब्दों का रेला
गलती नहीं तुम्हारी
मेरे निज
अपराधों का यह दंड मिला है !

मौन साध भीतर ही भीतर
जिया घुटन
अब कुछ मत कहना
प्राण प्रिये
तारंगित तन देह नहीं अन्तरकूटी
सुधियों का हारा हुआ किला है !

छुई मुई अनछुई अंगुलियां
पायल की झनकार
चूड़ियों की लय लोरी
मुस्कानों के
चल चित्र बाराती दूल्हे जैसा
जीवन का किरदार जिया,
बिछड़ गये मिलने के पहले
मेहंदी महके हाथ हमारे
रस्साकसी भीड़ के
भीतर तन
मन लक्ष्मण रेखा लांघ जहर
कोकाकोला सा खूब पिया,

कोल किराती कठिन कशालों की
तरकुटी में
बंजारों सा सहा सहज मन
रहा भटकता
निपट अकेला
जैसे किया गया दर बदर जिला है !

रहे देखते दूर से जलसा
मोह मुसेसे
हल्दी अक्षत फूलों की बरसात
थिरकते बेगानों के पांव
गाँव की
ठासम ठासा वक्षी भेटें,
बिना बात बतकही अघोषित
जनकपुरी का धनुष धरा
बिन तोड़े ताड़े
जीत स्वयम्बर
परशुराम सा ठाढ़े ठाढ़े
मूंछ मुरेरे बांह समेटें,

चिलम चौकड़ी चिलकें
मार ठहाके
ऊपर फूकें धुआं धुआं छत
मडवे भीतर गंध कसैली
गाल गिलौरी
रंग पान का ओंठ खिला है !

किया धरा पिछला सब स्वाहा
बदल गया पहचान पत्र का
पता ठिकाना
लिखी झुर्रियां
कमल कपोली कनपट नासा
भौंह लिलारे गुल गालों पर,
चलते चलते पल दो पल का
औचक ही यह मिलन तुम्हारा
दे रहा तसल्ली
जिरह की वेणी विरह का गजरा
महक रहा है लिये सफेदी बालों पर,

वेगवती नदियों सी बहती
जीवन धारा
कठपुलियों की पहुंच से पहले
काडी मार
बहा ले जाती है
यह समझ न आया कौन गिला है  !

भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...