Friday, 7 January 2022

देख रहा हूँ आंख के आंसू

देख रहा हूँ आंख के आँसू

दया भाव मुख
अपशब्दों का रेला
गलती नहीं तुम्हारी
मेरे निज
अपराधों का यह दंड मिला है !

मौन साध भीतर ही भीतर
जिया घुटन
अब कुछ मत कहना
प्राण प्रिये
तारंगित तन देह नहीं अन्तरकूटी
सुधियों का हारा हुआ किला है !

छुई मुई अनछुई अंगुलियां
पायल की झनकार
चूड़ियों की लय लोरी
मुस्कानों के
चल चित्र बाराती दूल्हे जैसा
जीवन का किरदार जिया,
बिछड़ गये मिलने के पहले
मेहंदी महके हाथ हमारे
रस्साकसी भीड़ के
भीतर तन
मन लक्ष्मण रेखा लांघ जहर
कोकाकोला सा खूब पिया,

कोल किराती कठिन कशालों की
तरकुटी में
बंजारों सा सहा सहज मन
रहा भटकता
निपट अकेला
जैसे किया गया दर बदर जिला है !

रहे देखते दूर से जलसा
मोह मुसेसे
हल्दी अक्षत फूलों की बरसात
थिरकते बेगानों के पांव
गाँव की
ठासम ठासा वक्षी भेटें,
बिना बात बतकही अघोषित
जनकपुरी का धनुष धरा
बिन तोड़े ताड़े
जीत स्वयम्बर
परशुराम सा ठाढ़े ठाढ़े
मूंछ मुरेरे बांह समेटें,

चिलम चौकड़ी चिलकें
मार ठहाके
ऊपर फूकें धुआं धुआं छत
मडवे भीतर गंध कसैली
गाल गिलौरी
रंग पान का ओंठ खिला है !

किया धरा पिछला सब स्वाहा
बदल गया पहचान पत्र का
पता ठिकाना
लिखी झुर्रियां
कमल कपोली कनपट नासा
भौंह लिलारे गुल गालों पर,
चलते चलते पल दो पल का
औचक ही यह मिलन तुम्हारा
दे रहा तसल्ली
जिरह की वेणी विरह का गजरा
महक रहा है लिये सफेदी बालों पर,

वेगवती नदियों सी बहती
जीवन धारा
कठपुलियों की पहुंच से पहले
काडी मार
बहा ले जाती है
यह समझ न आया कौन गिला है  !

भोलानाथ

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