Saturday, 18 December 2021

बाग बगीचे पीपल बरगद

बाग बगीचे पीपल बरगद 

ताल तलैयां नदियां झरने
चार चिरौंजी ही
नहिं होते
गांवों की पहचान !

सुबह सबेरे रंग विरंगी
फसल पुष्प की झली हवायें
सुरभित मौसम
प्रकृति गोद की
खेला खाया पला किसान!

लाल घड़े काले मटके का
ठंडा पानी
बौली कुआं कुआंरी कंधों
शीश मड़ाये घट पर घट
घैलों का छलका पानी,
झुकी आंख सीधी गर्दन
ठुमक चाल बधुओं के
भीगे घूंघट
झूमर झुमके रुनझुन पायल
खनक चूड़ियां रहट निशानी,

चुलबुल बिटिया चहके जैसे
चुलबुली चिरैया
बहु अबोली
सहे सास की जीभ कटारी
धरे जिया पूंजी अस म्यान !

मेलजोल भाई चारे का
सुखद आचरण
बांह बंदगी
खुशी गमी त्योहार पर्व की
भजन आरती का सहगान हिलोरा,
पूस माघ की ठंड कपाती
डिगला जैसी देह
रंगीला फागुन का मधुमास
पीटता
प्रेमालाप विरह का ढोल ढिढोरा,

नेह नयन अनुराग की
चित्त चितौनी
बेबोलों की नातेदारी
कुल गौरव की जीवित लज्जा
जिये छातियाँ तान !

आम बौर महुओं की बारिस
बरसज तेंदू बेर मुकैयां
गाय बैल
पशुओं के मेले
अनगिन हैं पहचान गांव की,
परिवर्तन क्या बदल सकेगा
घने वनों के चारागाह
खेत तरकारी
रूप प्रकृति का
छापें छोड़ शहर के पांव की,

आई गईं आंधियां कितनी
उड़े पैंतरे पाग
विरत भय अपने पाँव
अडिग
हिमालय सा है अपना हिंदुस्तान !

भोलानाथ

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