Thursday, 16 December 2021

कौन ककहरा सा गाता है

कौन ककहरा सा गाता है गीत यहां

चेहरा मोहरा
चमक मुखौटा चमकाने की
बेवजह रवायत
मुरदासंख लिपाई
लेप लपेटा धरती धरे न गोड़ !

नदिया के उस पार का धोबी भाई
गाये क ख ग घ अंगा
अखरा घोड़ पिठाहीं
लाद फ़ीन्च फ़रिहाव का माहिर
घाट घाट
चट्टान चढ़ाई का क्या जाने तोड़ !

बजती बीन के आगे नागिन नाच भरोसा
मजमा मौन टेढ़ अंगनाई
गेड़ी पाँव लड़ी घुंघरू की रुनझुन बाजे
मुरबा मुट्ठ उठाये
उंची उंची हांक
जमीनी दरख़्त को
माटी की महिमा समझाये,
पेट पीठ का पिटा जमूरा हूंके
हांक मदारी की सुन मुह की हूँकी
अन्तर्द्वन्दी लय की नाहीं
थिरकन पांव लचारी
लामबंद विपदाओं के
व्यूह घिरा अभिमन्यु जैसा
कौसल कौल रिझाये,

बिगुल फूंक सुन शोर
बजी रणभेरी का
एकतरफा युद्ध विराम
पाग विरत सिर झुके हुजूमों की
अगुआई फरमान
अथर्वा पियें पसीना बंडी बांह निचोड़ !

ओंठ अबाह खुली करियारी
लीद उठाते फोड़े मूंड़ उछाल दुलत्ती
मुट्ठी बांध कसे मुह जबड़े
पिछलगुआ अनुशरण न जाने
किस उपलब्धि के खातिर
दांत निपोर
नाद जयकारों के हिस्से हैं,
मौनी साधक सरबत बोरी गरू बयानी
करु बिक्ख मुह कान हरु
हुरहुर सी छौंक बघार
कचैंधी पेट गरू
अधपचे अम्ल की जलन
घरु उपचार निमौरी नीम गुरिच रस
जस नानी दादी के किस्से हैं,

रंगारंग रंगीले मुखड़े
चकाचौंध मशलों की
सांटा पलटी
चाल चरित चर्चा बाजारू
आन अहम पर उठती गिरती
साख राख सी अदब अदावट होड़!

हेलमेल आल्ह्वाद प्रेम के
नाड़ी नाद
उमड़ते स्वर मुह कान सुरों की तान
कंठ का कोयल जैसा गान
बगीचों बाग घनी अमराई
उपवन की मुस्कान 
तितिलिया शान दिखें न गुंजन भौरों के,
पके खेत खलिहान गडायन दांय
सजे सहगान
बैल के घंटे घुंघरू की पहचान
बरेदी बांस बंसुरिया
सधे न गीत रचाव
बुझक्कड़ रमी पहेली
शीशमहल से फेंके पत्थर घर औरों के,115

नई लकीरों के नव नामकरण
गुण गाथा में
तल्लीन विवेकी
वेद लवेद के विद्याधर हाथों की उठाधरी
काट रही है
जीवन रेखा अजब गजब गठजोड़ !

भोलानाथ








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