Friday, 3 December 2021

कोप भवन में बैठी बहु सा

कोपभवन में बैठी 

बहु सा 

व्यथित विपक्ष 

क्रोध की आग में 

मुह वाणी की 

फोरी लाई परछी फरका डारै। 


रीत रिवाज 

सास की समझाइश 

संदर्भ सगुन के 

सीख सुनै न 

ससुर की बंडी 

चूल्हा चिल्फी लकड़ी जैसे बारै। 


धूप 

देवालय की सुलगन का 

उठता धुआं 

दिखा दुनिया को 

ज्वालामुखी की आड़ में 

गाय गली 

रिछवा सा खूब नचावे,

लिसक नाच सम्मोहन के 

मंत्रोत्चारी 

विविध प्रयोगों का 

लय लहजा 

अंगुलियों घेर 

परिधि के 

बाहर डमरू शंख बजावे, 


झरे बाल 

कंघी के काढ़े 

भर ताबीज़ तैंतियाँ 

नरक भोगती 

भावुक रूह को 

वैतरणी के पार उतारै ! 


चढ़ते सूरज की गति 

आँख दिखे न 

सोन सुनहरी धूप को 

टूटी 

बिखरी घिसी पिटी 

ओजोन परत का 

मलबा बरसात बतावे,

पास पड़ोसी की 

पुस्तक से 

उल्टी गिनती कटा ककहरा 

आड़ी आयत 

फ़टे पेज का 

मार के रट्टा 

रामायण समझावे, 


निजपांव दौड़ती 

नेत नियति के 

पदचिन्हों की 

पुख्ता छाप में 

ओध अंगौछा 

बसन मुरेर निचोय निथारै । 


अर्ध चढ़ा 

माटी का तिलक किये 

जजबात के 

बहके जहन नहीं 

हैं बुद्धि विवेक के 

विश्लेषक 

उत्तम उन्नायक सत्कर्मों के,

पल दो पल ही सही 

जी लेते 

नीति निभा लेते 

सच्चाई 

साथ साथ चल लेते 

बहती विपरीत 

हवा अंधड़ अपकर्मों के, 


डायन डाह अहम में 

चूर 

जेठानी का किरदार 

अटारी 

ठाठ पटौती की 

बोई गाजर मूली रोज उखारै । 


भोलानाथ

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