Thursday, 9 December 2021

नाम गांव अनजान पथिक पथ

नाम गांव अनजान पथिक पथ

ठंड ठिठुरती
दुस्वार हवा के झोंकों में
अलगा अंचरा देह छुपाती
सेंके धूप न देखे आँख
हवस अनजान गुजरिया!

क्षितिज का सूरज चुपके चुपके
सरग से झांके
जैसे कुंती का
अभिमंत्रित आवाहन
रात बेधरमी बांग से चांद न चूके
खोजे मौका इंद्र जबरिया !

भक्ति भाव की बही नदी की
लहर धार के सख्त थपेड़े सहन किये
बह निकली हरी दूब सी
अलट पलट पानी मंडराती
तट हिचकोलों की
अनुचित ठोकर खा खा कर के
तना जिया जड़ वक्ष समेटे,
काई कांदो लथपथ
भूखे भैंसों के
अलग अलग जत्थों की रेवड़
देख दूब की हरी लौचियाँ
छोड़ चरौखर छुट्टा चारागाह
थूथुनों लार नकौटी
नाक बहाये शील सिंगौटी मेटे,

मनुज असुर पशु देव समयगत
वसीभूत
वल्गाओं का सिरा न खींचा
मार ठहाका दुस्साशन सा
खीच रहा है शहर गांव
चौपाल चौतरा देह की फरिया !

कंधों कखरी माझा पीठ
मरोड़ी बांह कलाई
भीष्म देह सी बांण बिंधे तन
मन लिखे घाव की पीर असह
किन कापुरुषों के नाम उधारी
खाता बही बिसाद हृदय
रंजोगम के किस्से,

तार तार तन
सड़क चौराहे रेल भीड़ बस अड्डे
चीख सुने सब मरा संवेदन
कैद कैमरे में करने का कोतुहल
किसने कितने फुटेज बनाये
दृश्य बालाती
आया किसके कितना हिस्से,

गूंगी बहरी भीड़
देखती रही धृतराष्ट्र सभा सी
लुटती रही लाज
किरदार कृष्ण का नजर न आया
लाइव चलती रही तस्वीर
होती साझा रही खबरिया !

आईं गईं सल्तनत कितनी
मनोरंजन की स्क्रिप्ट केंद्र में
अबला जीती रही उत्कृष्ट नरक के
नये नये निर्मित
दारुण दुख के दालिद सोपान
कहे किस मौसी से
जलती आग की रोज कहानी,
आते जाते अगल बगल से
कान फब्तियां कटु मस्काने
दे रहीं हिदायत आगी एसिड की
दहशत से थर थर कांपे पांव
चांद सा सुघर सलोना मुखड़ा
हाथ छुपाये
रोज रोज मर रही जवानी,

अँधाखुक्क हदों के बंद किवाड़े
झूठ मूठ उजियारी के
कथा बांचते थकें न अंधे
कोतवाली की रपट रसायन
परख कचहरी
पलटी साक्ष्य लबरिया !

भोलानाथ

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...