सीके से
व्यामा की दूरी
ठाढे ठाढे बिलैयां
पहिनती हैं शोहरत के माले !
चंचल छली
चापलूसी के माहिर
श्रीफल उपन्ना
ओढ़ाते हैं चूहे चढ़ चढ़ के आले !
दशकों के लटके
झटके कला के
देखता रहा
और सुनता रहा
गूंगे बौरों सा सारा शहर,
गहराई गीतों में
झलकी नहीं
लोकगीतों के शिल्पी
सुनाते रहे
एक जैसी बहर,
जाल बुनती रही
ठाठ मलगा कोरैया
मनमानी
मकड़ों की टोली घर बैठे ठाले !
पंजे घिसे
खंभा अब भी सलामत खड़ा है
खिसियानी खीझों से
डर के
पहिने न दुनिया सुथन्ना,
तलवारें टूटी
घीचें कटी हैं
बहती रही नदियां नारी
इतिहास जीवित है
ओढ़े उपन्ना,
मौसम खुला है
न आंखें दिखाओ
नचाओ न बादल
उंगलियों में फिर काले काले !
मुकुट बादशाही का
फिर लौटे मुमकिन नहीं
म्यूजियम में रहने दो
तीर तोप
तरकस तलवारें ,
जागी अधजागी
करवट कवायत का
व्यूह तोड़ रैयत का साहस
सुने नहीं
ओछी ललकारें,
कबीलों ने
काट दी अस्तीनें
काम नहीं आयेंगे
जयचंद टोपियों के पाले !
भोलानाथ
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