टेढ़ी भौंह टेढ़ टेढ़ गया समय साल
महुआ सा कूट केक्या करते
गली गांव फरका से रूठ के !
स्यासा का घूर लगा अटा आंगन में
धूर धुआं
हार थक
हांफती गिलहरी खोखल में ठूंठ के !
मनभावन अवसर का शव लादे
कन्धों में
सूर्यरथी लीकों की धूल में
उम्मीद ओढ़ी दरी सी बिछायी,
आत्म रक्षा की कोशिश मेहराब की
छिन्न भिन्न धूप सी
अस्मिता का
युद्ध हार सांझ ढले हाशियों में आयी,
परिधि व्यास वृत्त के आवर्ती फेरे
दिनचर्या चाल की
चली चाल
पांव नहीं दिखते हैं झूठ के !
आगत के स्वागत सत्कार की
पुलकावलि
बिगड़े मौसम की झंझवाती
सांझ की संझवाती द्वार धर रही,
शुभकामनाओं की सुरभित सुवासित
उत्साह अर्चन के पुष्प पत्र
अक्षत सा
भीतर की मुंह बोली प्रीत झर रही,
कसालों के कांटे चुभे पांव
चल के
आंचर की झोरी चुने
बेर पर वर्क से लेप हैं जूठ के !
बेजर दुरुस्त है हाजमा खट्टा मीठा करु
सब पेट में
पचा के
जी लेते हैं डांगर सा ढांचा गला के,
ठोकरों के आदी मिन्नतों के घूर नहीं
खरभराते खर्रा में
लेटे हैं
वक्ष की अंगीठियां जला के,
भिन्न भिन्न तुर्रे तब्दीलियों के तेवर
आपदा के
वक्त में
ठाढ़े मरे जैसे मारे हों मूठ के !
भोलानाथ
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