Wednesday, 22 May 2024

आवर्तित आरोप अधूरे

आवर्तित आरोप अधूरे अरझी आधी सांस 

उधार अधारी
पीड़ित कंधों
कांख बंटी न रहे बदलते बारी बारी !71

ओंठ अलख अलखा के बेअदब अर्थ की
नासमझी खैराती बक्कुर का
प्रण सुन सुन 
हने हुमक के हाथों पांव कुल्हारी !71

बेसुरे बिगुल के लय साधक साध रहे
टेढ़े मेढ़े आंगन में 
रीछ नाच के
ठुमकों ठुमकों टूटे घुंघरू के स्वर,70

भटके भाव पलों के खीटे उर उझरीटी
बेल की खींची कलथी
घायल घेंटी
निधड़क नीछें बेच बाजार हया डर,70

भरे पेट नंगदांव हेडियों कान मरोड़ी
उत्साही उत्पात
पड़ा मूड़े माथे 
जस चुंदी चढ़ी चुड़ैलों की किलकारी !71

सांकेतिक शब्दों की हृदय हिलोरी राग रागिनी
जहन जीभ से गायब
ओंठ अड़ी
अपमान ककहरा रट लिया जतन से,70

सन्निपात पथ पांव रुके न हठ जिया
जिया भर
पानी पांव प्रच्छाल छुआ न
कथरी ओढ़ भृकुटियां टेढ़ी रहीं वतन से,70

मुद्दे मूड गठरियों गांठी खोल गिनाते
जैसे भारत गढ़ा इन्होने
नभ धरती की
गतिविधियां हैं इनकी रचनाकारी !71

बदले मौसम की इस तेज धूप की चमक में
कान उटेरे
जख्मी जज्बात सुनें न
अंधियारों से जिन्नातों की बोली,71

बिखरे बिपरीत दिशाओं के थक हारे
मनभाव क्षणों  के
खुले चक्षु टकटकी दृष्टियां
धीरे धीरे उत्तरायण की हो ली, 71

आंख में आंखें डार टटोली नब्ज रोग पहचान
पथरियों
चंदन जैसी
घिसी बूटियां तब तन मन की घटी बिमारी ! 

भोलानाथ 

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...