मुँह गुरतुर दिल जहर हितैषी
अखरे जैसे
अंगुरी अंगुरी नख के नीचे
रह रह चुभती फांस !
उलहन उलहन आँख आँसती
धुंआ रसोई भात भगौना
भांप
सांप सी छाती लोटे सांस !
जरन बरन की लपट हवा मिल
सेंक सेंक कर
कान के परदे
जहन में आग लगाये,
हाथ सेंकती भीड़
भितरिया जतन जायका
भेद अलहदा
मुहदेखी की मुँह बतियाये,
खाली पेट बेदाँत मोलाते
भेड बकरियों जैसे
कूते कुटिल कसाई
जीवित देह का मांस !
चर्चाओं के रंगे बताशे
कान
राग बगदरी
ओंठ के मंजे मंदारी हैं,
सरस्वती पुत्र गणपति के
साधक
गरु गुरु जी हरु बोल
आवर्ती गायन दोधारी हैं,
मौनमुखी सुन देख समझ
खरभरी मचा न
पुआल के भीतर
अकबकी के आलम धीरे धीरे खांस !
इस उस डार कूद न
भर किचकार दांत की
बंदर जैसे
दूर रहें नटखट उत्पाती,
सत्यम शिवम सुंदरम
अलख जगायें
जियें जिलायें छोड़ ठगी
अलखायें न ठकुर सुहाती,
महमह महक उठे पुरवाई
शरद सूचना देत
थकें न हारें
रन बन फूलें धानी धरती कांस !
भोलानाथ
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