हलाकान परेशान थे पर भूखे न थे
तब पी पी घ्यांघ मठा महुओं के
गुजारे दिन
अब दिवस सांझ दो जून के भूखे हैं !
अभी सिथिल सौगात देह के हिलते
पुर्जे पुर्जे
आमद की परवाह में पचके गाल
अमाशय आंत ओंठ रस सब सूखे हैं !
आमद शून्य शिखर महगाई,लटपट
जिभ्या ओंठ चांटते पेट भरे न
रोटी नून की भीख सी
चाहत अलखाते दिन पर दिन निकरे,
ढलते दिन की बाढ़ी छाया हाल न पूंछे
सबोधन के प्रतिउत्तर में
झुंझलाते
संवाद समापन बिपत में छोड़ के संकरे,
आफत के अम्बार का दुःख क्या कम था
अनचीन्हें मेहमान सरीखा
नया नया दुःख पा के
बोल कंठ के कुछ कडुवे कुछ रूखे हैं!
डगमग चाल बहकते पांव लीक पर
बिगड़ रहा संतुलन सम्हारे कैसे
बांह बिराती
भीतर पाली इच्छाओं की उडी चिरैयां,
क्या कुछ शेष रहा अधमरी देह में
हांके हाथ न नाक की माछी
जगह जगह से
बारी बारी खखलें छत्तेदार बर्रैयां,
बुझती आग अंगीठी धुआं उठे न धधके
आगी
बर्राते मुख गुर्राते चेहरे
दबी आग सी हाथ लकुटियों के खूंखे हैं !
गंम्भीर नहीं है आंख का तारा न ही
वक्ष की उजर तरैयां
तारा मंडल बंध भूली हैं
गोद पिता की महतारी का प्यार,
उनके अपने अपने खुली आंख के
सपने अलग अलग हैं
बूढ़ विचार सुनें न माने
कौड़ी लेखे घर आंगन खेला कूदा द्वार,
टूटे पेट बंधी उम्मीदें ख़ाली ख़ाली तबा तबेला ख़ाली भात भगौने
भीतर
भरी आंख धर मुख गमछों के मूखे हैं !
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