पगड़ी पाग मुंडौसे धर धर आंख लगे न
कलथी करवट
टोरे खटिया
चुटकी ऐंठ चढ़ाते टूटें पकी मूंछ के बाल !
सावन की बरसात अँधेरी रात न सूझे
चिंताओं की चिनगी
रहे फंसाते
भावावेग नदी के गहिरे डारे जाल !
घाट घाट सब भरी पाट के कगरे डूबे
नाक के ऊपर चढ़ता पानी
देख मछलियां भाव बहर से
कूद कूद के चढ़ गईं उलटी धार,
छप्पर टूटा चूल्हा फूटा धार धार
बह रही गिरस्ती हीची हिम्मत
हारी हारी हाट खड़ी है
बोली में है पानी का व्यापार ,
रिमझिम रिमझिम रुके न बरखा
पानी से मिल पानी बहे चौगिर्दा
बेपरवाह
पहाव पिठाहीं जैसे लदा हुआ बैताल !
बाढ़ भयावह लख लख सांस सवाई
नाव बहे बेरास थमे न
बुद्धि बिसाहे तेल में रपटी
रटा पहाड़ा विस्मृत भागे भूत जहन के,
बजरंगबाण का पाठ मन्त्र ओठों का झरना
सांस सांस संदर्भ सुरक्षित
बिम्बायित हैं
आंखी अक्स पुतरियों लंका आग दहन के,
पुरवाई ले उडी वक्ष की शांति ,सुकूनों का
सुर्खाब समय
रह गये चकत्ते चित के सुध बुध
भूल भरोसा भटके मन का ख्याल !
भग्नाशेष किलों के शिलालेख मिट गये
रही न शाहंशाही शेष
परन्तु पन पंथों की बग्घी का
रंग उड़ा न थमे लीक के चलते पहिये,
ऋतुयें बदलीं बदले मौसम समय की
पहुँच के बाहर
रहीं रूढ़ियां पानी पोखर भैंस मर्म
किस औघड़ से अंसुआ ढार के कहिये,
तांडव नर्तन एक सा सबका कंठ हलाहल
हंस हंस उगलें
शीश जटाओं के
क्षत्रप की छाया फन काढ़े हैं व्याल !
भोलानाथ
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