थूक दिया रे थूक दिया भरी मुख
पान पीक
हक मालिकाना समझ के
जटा जूट थूथुन से पांव भर
थूक दिया रे !
उपर दोमंजिला खिड़की के
पर्दे हटा के
नीचे न देखे निहारे क्षितिज
खोंपा मोगरी का जैसे
उलूक जिया रे !
आंगन खड़े हो हकलाते हलक बोल
कांपते जिगर हंफहंफाती भरी दम
किस मुंह से कहते
जाहिल जमाती बिगड़ैल को,
अंधेर नगरी के द्वन्द में कौन चाहेगा
देखना सावन के अंधों के
वक्ष पले
भीतरी कबंध की ओंठ रची मैल को,
अकथ कत्थ्य तथ्य के विरोध का
आत्मघाती कहर
स्वाति
बरखा के जैसे जहर रोज बूँद बूँद
मूक पिया रे !
बीछी बर्रइयों का मन्त्र नहीं सीखा
सहज भोर
बांमी में हाथ कैसे डालूं
मालुम है संवेदन फन काढ़े सांप का,
लाठियों का खेल खले ओझल है
आंख से संपेरा
बेदखली आलम के बगलगीर
गूंगों को भान नहीं मेरी अलाप का,
ताड़ चढ़े अभय भाव पढ़ पढ़ के
करुण हृदय अश्रु ढार
पूंछ रहीं
सजल आंख किस गुरूर के लिये
यह सुलूक किया रे !
शाहंशाही का शाह नहीं तू भी
पहरेदारी का
कुछ मान रख
रोज लबरी लपेटों के
माया जाल का अंजाना भय न दिखा,
दरबारी बैठका की धूर धौंस झार वहीं
ओजस्वी हरु गरू गोड़ गैल रहने दे
चलने दे
पांव पांव खेलना और न सिखा,
आंजी आंख खोज लेंगी सूजियां
भूसे के
ढेर से
ढलने दे पहर पहर बरसाती रात
मत फूंक दिया रे !
भोलानाथ
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