Wednesday, 3 July 2024

गंध गई न मन की

गंध गई न मन की इसको धमकी 

उसको गाली 

पन्ने फाड़ 

ग्रन्थ के रहे कोसते पी पी पानी ! 


आंख खुली तो अस्त व्यस्त देखा 

चौहद्दी 

बे पानी 

मर गई चिरैया पिंजरा छोड़ निसानी ! 


वेद का भेद लबेद न जाने रहल लपेटी 

धरी पटौती अपढ़ ऋचाएं 

पकड़ा नहीं 

रश्मि का ज्योतिर्मया पुंज सी पूंछ, 


बैतरणी के घाट घाट की गहरी गाढ़ी 

धुंध के भीतर  


धार न झलके 

अंदाजों की कसी मुट्ठियां टेढ़ी मेढ़ी मूंछ, 


कनपट कान छुआ न दौड़ चला 

कौओं के पीछे

घुटनों बुद्धि 

रुके न थके थके हांफे मनमानी ! 


बढे मूंड ख़ाली हाथों का बंदोबस्त 

बस्ते में बंधक 

जाहिल जहन के घूरे 

हवा झले न सुलगे दगे न भीतर आग, 


पुरखों के पद चिन्ह पढ़े न समझे 

बाबा भीम की 

ओंठों थूंकी पींक अंजुरियों 

भर भर रागी जी भर खेलें फ़ाग, 


टुकड़े टुकड़े तोरण टूटे आंगन 

रार देहरियों की 

तकरार 

न जाने घर खोंपा की हानी ! 


बक्री शनि की छाया सिर का साथ न छोड़े 

सह सह समय थपेड़े थाप 

न बदली चाल 

चट्टानों तरुआ तन गिट्टी सा फोड़े, 


राहु केतु की दशा निराली बिचलित मन की 

गड़बड़ झाला 

पोर पचासी गिन गिन 

पंहुंचा पकड़ पांत में पांच को जोड़े, 


कुछ कुनबों की भीड़ बटोरी 

गरजे बहुत न बरसे 

सावन की 

पलटी पछुआ में जल रही जवानी ! 


भोलानाथ 

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