Sunday, 11 August 2024

धानी धानी पोशाकें पहिन आया सावन

धानी धानी पोशाकें पहिन
आया
सावन
बाँहों में भर भर बदरिया !
               बेदर्दी बालम न आये !

मौके मिलन के निकले हैं कितने
कह कह जिगर
जिया
आये न मिलने संवरिया !
            सावन की रिमझिम रुलाये !

नीड़ नयन फगुआ की सोई चिरैया
रिमझिम
फुहारों की भीगी
जाग गई आज आधी रात को,

भीगा बदन आग अंतर की रह रह
देहियां जलाये
रूठा
रिसाया जिया है पिया मुलाकात को,
सुधियों की जी भर ठिठोली के
रंग में
रंगी है
ओढ़ी ओढ़ाई चुनरिया !
            पथ लखती घूंघट उठाये !

अकारथ सी लगती मोबाईल की मूवी
सखियों की
चुलबुल चुहल
धंसती कटारी सी बिरही जिया,

झरे फूल चर्चा के मकरंदी अमृत
रिसरिस के
बहता जहन में
जैसे अभी ताजा ताजा पिया,

छुअन ओंठ बिसरी नहीं
मिश्री
मावा सा वादा
काजल सी आंजी सुरतिया !
            बिछी द्वार दिल को बिछाये !
चिट्ठी नहीं खबर मैसेज़ में आई
अवकाश
मिलता नहीं
पिछले वादे वही दुहराये फिर से,

पढ़ पढ़ संदेसा बिचलित हुआ मन
सम्हाले न सम्हले
थर्राया
जैसे निकल गई घिघोरी सिर से,

बिरह बेल किसी तरह सूखे
फिर भेजूं
परदेश पाती
लिख लिख दिल की खबरिया
                समझें न जिया की बताये !

भोलानाथ 

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