आंख है बावरी सांस है बावरी
आश
कान्हा की है बावरी बावरी !
प्रीत है बावरी धीर है बावरी
खोज में
फिर रही है बावरी बावरी !
तुम बिन मोहन मोहती नहीं है
मन को
तुम्हारी खबर,
तन मन के सूने निधि
वन में
ठहरती नहीं है नजर,
भवरों की गलियों कलियों के
वन में
ढूंढें तुम्हें बावरी बावरी !
ठिकाने पते पतियां
लौटी न
लेके मन का संदेसा
तेरी छवि के सिवा
कान्हा
आंखों दिखे न रेफ रेशा,
घिर आई बदरिया बरसे न भीगे
सजी
सूखी धरी देह है बावरी बावरी !
बेसुधी के इस वक्त में
प्रगटो
जग के लिये फिर कन्हैयाँ,
पैजनियां पहिन
नाचो
कालियों के फन पैयां पैयां,
आज के कंस के विनास में
स्वर बांसुरी के
सुन रही है बावरी बावरी !
भोलानाथ
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