तय किया है बहुत कुछ अभी शेष है
जिंदगी का सफर
चलते रहना है कहना है
उस छोर की आखिरी आखिरी !
आगे कुआं पीछे खाई की काढ़ी हैं फाँसें
काढ़े
कढ़ी न कनिष्ठा के
उस पोर की आखिरी आखिरी !
वक्त भी है अभी सांस भी स्वच्छ है बूढी
बांहों के
बूढ़े नहीं हौसले
कद से ऊपर हैं संझा की परछाईयां,
फिरे गाते फकीरी प्रभाती सुबह की
कानों न रेंगे जुआं
मुंह ढक के सोये
सिरों के सिराने खुदती रही खाईयां,
गुलामी के बख्तर से बाहर निकल
अब वतन के लिये
भांप गैंती शिलाओं के
उस शोर की आखिरी आखिरी !
होश हीन भीतर का अभिनय हैश्राप बंधु
बंधुआ संवेदन का द्वार खोल
धुंध बहुत
गहरी है घड़ी नहीं और अब विलास की,
कंटकों के बीच घिरी जिंदगी कुछ तो
आसान कर
कामयाब हुये वही जिनने खोखले
रिवाज की रीढ़ में पांव पथ तलाश की,
जी हुजूरी का व्यूह तोड़ गर्दिश में
गांव है
दे दे पैगाम उन्हें
उस गैल खोर की आखिरी आखिरी !
भाग नहीं सिद्दत से जूझ इस आड़े वक्त से
बैठेगा कब तक मन मार के
कसालों का बंदर
कूदेगा डार से एक दिन जरूर,
खड़े होने की कोसिस तो कर लहु पोषित
आदर्शों का रंगीन अजगर
राह छोड़ भागेगा
चौकड़ियां भरते शावकों से दूर,
कर भरोसा धुकधुकाती नब्ज पर
निर्बल नहीं
यह बंधा बैल है
सरफूंदी खोल डोर की आखिरी आखिरी !
भोलानाथ
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